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Biggest Enemy of Israel: जानिए कौन था इस्त्राइल का सबसे बड़ा दुश्मन, जिसकी मौत आज भी रहस्य है

Tue, 21 Jan 2025 12:54 PM IST
धर्मेंद्र सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला Published by: धर्मेंद्र सिंह Updated Tue, 21 Jan 2025 12:54 PM IST
सार

Biggest Enemy of Israel: कई संगठनों को मिलाकर 1964 में एक बड़ा संगठन फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) बनाया था। जिसका मकसद था फिलिस्तीनीयों के अधिकार हासिल करना। यासिर अराफात 1968 में इसी संगठन के मुखिया बने थे।

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Biggest Enemy of Israel: Who Is the Biggest Enemy of Israel Know Name and Death Mystery
ये शख्स था इस्त्राइल का सबसे बड़ा दुश्मन! - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

 

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Biggest Enemy of Israel: इस्त्राइल और हमास के बीच करीब 15 महीने से चल रही जंग पर रोक लग गई है। फिलिस्तीन के गाजा शहर में इस्त्राइल के साथ लंबे संघर्ष के बाद हाल ही में युद्ध विराम लागू हो गया। युद्धविराम लागू होने के कुछ घंटों बाद हमास ने इस्त्राइल के तीन बंधकों को रिहा कर दिया। आतंकी संगठन हमास ने सात अक्तूबर 2023 को इस्त्राइल पर हमला किया था। इस दौरान हमास के लड़ाके 251 इस्त्राइल नागरिकों को बंधक बनाकर ले गए थे।

इसके बाद इस्त्राइल ने एलान किया था कि वह हमास का खात्मा करने के बाद ही रुकेगी, लेकिन 15 महीने की लड़ाई के बाद अब युद्ध विराम लागू हो गया है। इस्त्राइल को हमास अपना दुश्मन मानता है, लेकिन आज हम आपको अपनी इस खबर में बताएंगे कि इस्त्राइल का सबसे बड़ा दुश्मन किसे कहा जाता है। इस युद्ध के करीब 60 साल पहले एक ऐसा नेता उभरा था, जिसे बाद इस्त्राइल का सबसे बड़ा दुश्मन कहा जाने लगा। इस फिलिस्तीनी नेता की मौत के करीब 19 साल हो चुके हैं, लेकिन इसकी मौत का रहस्य आज भी अनसुलझा है। आइए जानते हैं कि आखिर वो कौन नेता था, जो इस्त्राइल से इतनी नफरत करता था। 

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इस फिलिस्तीनी नेता का नाम यासिर अराफात था। दरअसल, कई संगठनों को मिलाकर 1964 में एक बड़ा संगठन फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) बनाया था। जिसका मकसद था फिलिस्तीनीयों के अधिकार हासिल करना। यासिर अराफात 1968 में इसी संगठन के मुखिया बने थे। अराफात के नेतृत्व में उनके संगठन पीएलओ ने शांति के बजाय सशस्त्र संघर्ष पर अधिक जोर दिया। इस संगठन के निशाने पर हमेशा से इस्त्राइल ही रहा। विमानों का अपहरण, लोगों को बंधक बनाना और दुनियाभर में इस्त्राइली ठिकानों को निशाना संगठन का मकसद बन गया था।
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असल में अराफात इस्त्राइल के अस्तित्व के सख्त खिलाफ थे, लेकिन 1988 में उनकी छवि अचानक बदल गई और सशस्त्र संघर्ष को बढ़ावा देने वाला यह शख्स संयुक्त राष्ट्र में शांति के दूत के रूप में नजर आया। पहली बार किसी राष्ट्र के नेतृत्व न करने वाले शख्स को यह सम्मान दिया गया था। बाद में उन्हें शांति के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 


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माना जाता है कि नेहरू-गांधी परिवार के साथ अराफात के बहुत करीबी रिश्ते थे। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी को वो अपनी बड़ी बहन मानते थे। यह भी कहा जाता है कि 1991 के चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने राजीव गांधी पर होने वाले जानलेवा हमले को लेकर आगाह भी किया था। 

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यासिर अराफात की मौत की खबर 11 नवंबर, 2004 को मिली थी। बताया गया कि उनकी मौत बीमारी के कारण हुई, लेकिन कुछ ही महीनों बाद यह दावा किया गया कि उनकी मौत जहर से हुई है और इसका इस्त्राइल पर आरोप लगा। इसके बाद जांच के लिए उनके शव को कब्र से निकाला गया। स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया कि उनके शव के अवशेषों में रेडियोधर्मी पोलोनियम-210 मिला था। हालांकि, अब भी उनकी मौत दुनिया के लिए एक पहेली ही बनी हुई है, जिसपर से शायद ही कभी पर्दा उठ पाए। 

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