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White Traffic Light: लाल, पीली और हरी के बाद अब 'सफेद'? क्या बदलने वाले हैं ट्रैफिक के नियम?

Fri, 23 Jan 2026 10:41 AM IST
सुयश पांडेय ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुयश पांडेय Updated Fri, 23 Jan 2026 10:41 AM IST
सार

सेल्फ-ड्राइविंग कारें अब सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहीं और अमेरिका में Waymo जैसी कंपनियां इसे वास्तविकता बना चुकी हैं। इसी को देखते हुए वैज्ञानिकों ने ट्रैफिक मैनेजमेंट को बेहतर बनाने के लिए ट्रैफिक लाइट सिस्टम में एक नई 'चौथी लाइट' जोड़ने का सुझाव दिया है, जिसका रंग सफेद हो सकता है। 

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White Traffic Light Explained: A New Signal for Self-Driving Cars Could Cut Jams and Save Fuel
White Traffic Light - फोटो : X

विस्तार

हम अक्सर हॉलीवुड की फिल्मों में अपने आप चलने वाली कारों (सेल्फ ड्राइविंग कार्स) को देखते आए हैं, लेकिन अमेरिका जैसे देशों में 'Waymo' जैसी कंपनियों ने इसे हकीकत बना दिया है। अब सवाल यह है कि क्या हमारी सड़कें और ट्रैफिक लाइट्स इन नई गाड़ियों के लिए तैयार हैं? वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में ट्रैफिक जाम और ईंधन की बर्बादी रोकने के लिए हमें मौजूदा 'तीन बत्तियों' (लाल, पीला, हरा) वाले सिस्टम में एक चौथी लाइट जोड़नी पड़ सकती है, जो शायद 'सफेद' रंग की होगी।

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यह 'सफेद लाइट' आखिर है क्या?

उत्तरी कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 2020 से इस विचार पर काम करना शुरू किया। उनका सुझाव है कि जब सड़कों पर ऑटोनॉमस व्हीकल्स (AVs) यानी 'बिना ड्राइवर वाली गाड़ियों' की संख्या बढ़ जाएगी तो ट्रैफिक लाइट्स को उनके साथ तालमेल बिठाना होगा।

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यह कैसे काम करेगा?

सफेद लाइट का मतलब: जब सिग्नल पर सफेद बत्ती जले तो इंसानी ड्राइवरों (हम और आप) को केवल एक ही नियम का पालन करना होगा, 'अपने आगे वाली गाड़ी को फॉलो करें।' अगर आगे वाली गाड़ी चल रही है तो चलें, अगर वह रुक रही है, तो रुकें। यह लाइट तभी चालू होगी जब सिग्नल को पता चलेगा कि चौराहे पर पर्याप्त संख्या में सेल्फ-ड्राइविंग कारें मौजूद हैं। ये कारें आपस में और ट्रैफिक सिग्नल से वायरलेस तरीके से बात कर सकेंगी और ट्रैफिक को सुचारू रूप से चलाएंगी। जब तक सफेद लाइट नहीं जलती तब तक लाल और हरी बत्ती के नियम हमेशा की तरह लागू रहेंगे।

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भारत के लिए इसका क्या मायने हैं? 

भारत में ट्रैफिक जाम में फंसना और बार-बार क्लच-ब्रेक दबाना ईंधन की भारी बर्बादी का कारण बनता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस नई 'व्हाइट फेज' तकनीक के दो बड़े फायदे हैं जो भारतीय सड़कों के लिए वरदान साबित हो सकते हैं। जब गाड़ियां बार-बार रुकती और चलती नहीं हैं तो फ्यूल की खपत काफी कम हो जाती है। सिमुलेशन में पाया गया कि यह चौथा सिग्नल ट्रैफिक को तेजी से निकालने में मदद करता है।

आंकड़े क्या कहते हैं? 

शोध से पता चला है कि अगर सड़क पर मौजूद कुल गाड़ियों में से केवल 10% भी सेल्फ-ड्राइविंग कारें हों तो ट्रैफिक में देरी 3% तक कम हो जाती है। अगर यह संख्या 30% हो जाए तो देरी में 10.7% तक की गिरावट आ सकती है।

क्या यह भारत में संभव है?

हालांकि यह विचार सुनने में बहुत अच्छा लगता है लेकिन भारत जैसे देश में इसे लागू करना आसान नहीं है। इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। भारत के हर चौराहे पर ट्रैफिक लाइट्स को अपग्रेड करना और उन्हें स्मार्ट बनाना एक बेहद खर्चीला काम होगा। भारतीय ड्राइवरों को नए नियमों के अनुकूल होने में समय लग सकता है। जहां लोग पीली बत्ती पर भी तेजी से निकलने की कोशिश करते हैं, वहां 'आगे वाली गाड़ी को फॉलो करने' का नियम अराजकता भी पैदा कर सकता है। यह सुनिश्चित करना कि सभी कंपनियों की सेल्फ-ड्राइविंग कारें एक ही प्रोटोकॉल या भाषा में सिग्नल से बात करें, एक बड़ी तकनीकी चुनौती होगी।

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