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Green Hydrogen: क्या लोगों के बीच लोकप्रिय ईंधन बन सकता है हाइड्रोजन, सफल बनाने में क्या है चुनौती?
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Hydrogen Energy
- फोटो :
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को एनटीपीसी की कई हरित ऊर्जा परियोजनाओं की आधारशिला रखी है। इसके अंतर्गत लेह और गुजरात में हरित हाइड्रोजन पैदा करने की परियोजनाएं शामिल हैं। लद्दाख के संयंत्र से देश के व्यावसायिक वाहनों के लिए हरित हाइड्रोजन का उत्पादन किया जाएगा। पीएम ने इसके साथ ही यह घोषणा भी की है कि लेह में हाइड्रोजन से चलने वाली बसों का परिचालन शुरू किया जाएगा। इसके साथ ही हाइड्रोजन की एक ईंधन के रूप में औपचारिक शुरूआत हो जाएगी। हालांकि, इसके बाद भी हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में सफल बनाने के लिए देश को कई चुनौतियों से पार पाना होगा।
ग्रीन हाइड्रोजन आवश्यक क्यों?
दरअसल, ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन पानी में बिजली के तेज प्रवाह के द्वारा पैदा किया जाता है। इसके लिए उपयोग में आने वाली बिजली भी सौर ऊर्जा से पैदा की जाती है, लिहाजा इसमें शून्य प्रदूषण पैदा होता है जिसके कारण इसे ग्रीन हाइड्रोजन का नाम दिया जाता है। इसके अलावा स्टील और सीमेंट उत्पादन में उपयोग किया जाने वाला ग्रे हाइड्रोजन भारी प्रदूषण पैदा करता है, जबकि ग्रीन हाइड्रोजन अपने इस्तेमाल के दौरान भी प्रदूषण नहीं पैदा करता, लिहाजा इसे ग्रीन हाइड्रोजन का नाम दिया जाता है।
दुनिया जिस तरह ‘शून्य कार्बन उत्सर्जन’ की तरफ बढ़ने की कोशिश कर रही है और जिन देशों के उत्पाद जीवाश्म ईंधन के उपयोग के बाद तैयार किए जा रहे हैं, उन पर कार्बन टैक्स लगाने का विचार बढ़ रहा है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने उत्पाद सस्ते बनाए रखने के लिए देश को ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग करना अपरिहार्य हो जाएगा। वैश्विक वातावरणीय प्रतिबद्धताओं के साथ जुड़ा भारत भी अपने लिए 2070 तक ‘शून्य कार्बन उत्सर्जन’ के मानक पर खरा उतरने का लक्ष्य निर्धारित कर चुका है। ग्रीन हाइड्रोजन को लोकप्रिय बनाए बिना यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा।
यदि ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का प्रयोग भारत में सफल साबित हुआ, जिसकी संभावना काफी ज्यादा है, तो इससे भारत को बड़ा लाभ होगा। इस समय देश को तेल आयात पर सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। यदि ग्रीन हाइड्रोजन का देश में उत्पादन और उपयोग व्यावसायिक स्तर पर सफल रहा तो इस खर्च में भारी कटौती होगी। साथ ही वातावरण को साफ रखने, वायु प्रदूषण के कम होने से स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी लोगों को काफी मदद मिलेगी, लेकिन इसके लिए हाइड्रोजन को तकनीकी और आर्थिक तौर पर सफल बनाना होगा।
क्या है मुश्किलें?
लेकिन हाइड्रोजन को लोकप्रिय बनाने में देश के सामने कई मुश्किलें हैं। अभी जीवाश्म ईंधनों के द्वारा पैदा किया जा रहा हाइड्रोजन 340 से 400 रूपये प्रति किलो की लागत पर बाजार में उपलब्ध है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यह कीमत 150 रूपये प्रति किलो के आसपास लाए बिना हाइड्रोजन को लोकप्रिय बनाना बेहद मुश्किल होगा। इसके लिए वाहनों के इंजन में बदलाव और हाइड्रोजन के अति ज्वलनशीलता को कम करने की आवश्यकता है। इसके लिए भारी तकनीकी और आर्थिक निवेश करने की आवश्यकता है। भारी मांग न देखते हुए तुरंत निजी क्षेत्र इसमें बड़ा निवेश करने के लिए इच्छुक नहीं है, लेकिन इसके लोकप्रिय होते ही प्रमुख ऊर्जा कंपनियां इस क्षेत्र में सामने आ सकती हैं। तब तक केंद्र सरकार को ही इसे सफल बनाने के लिए काम करना होगा।
ग्रीन हाइड्रोजन में लक्ष्य
केंद्र सरकार ने इसी वर्ष फरवरी में राष्ट्रीय हाइड्रोजन नीति की घोषणा की थी। इसके अंतर्गत 2030 तक देश में प्रति वर्ष 50 लाख टन हाइड्रोजन का उत्पादन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी कह चुके हैं कि भारत में ग्रीन हाइड्रोजन को लेकर अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने उम्मीद जाहिर की थी कि देश इस सेक्टर में विश्व का नेता बनकर उभरेगा।
क्वाड देशों में सहयोग जरूरी: आरके सिंह
जनता को स्वच्छ और सस्ता हाइड्रोजन ईंधन उपलब्ध कराने को लेकर क्वाड (भारत, आस्ट्रेलिया, जापान और यूएसए) देशों के अधिकारियों और सेक्टर से जुड़े विशेषज्ञों की एक बैठक 29 जुलाई को दिल्ली में हुई। इस बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री आरके सिंह ने कहा कि हाइड्रोजन को सर्वसुलभ बनाने के लिए क्वाड देशों को आपस में तकनीकी सहयोग बढ़ाना चाहिए। हाइड्रोजन ईंधन के इस्तेमाल के लिए उपयोग में आने वाले उपकरणों को न्यूनतम दर पर सहयोगी देशों को उपलब्ध कराने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। तकनीकी दक्ष मानव श्रम को भी एक दूसरे के लिए उपयोग कराने के बाद ही हाइड्रोजन को एक फ्यूचर फ्यूल के रूप में स्थान दिला पाना संभव होगा।
इस उच्चस्तरीय बैठक में हाइड्रोजन फ्यूल के उन सेक्टरों को पहचान करने पर भी सहमति बनी, जिनमें क्वाड देश एक-दूसरे को बेहतर सहयोग देने पर काम कर सकते हैं। इसमें तकनीकी-उपकरणीय सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए भी काम करने पर प्रतिबद्धता जताई गई। अनुमान है कि इसके बाद भारत में ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में निवेश करने के लिए कुछ कंपनियां सामने आ सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो भारत में ग्रीन हाइड्रोजन को सार्वजनिक ईंधन बनाने में बड़ी मदद मिल सकती है।