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वीआईपी नंबर के लिए आरटीओ नहीं वसूल सकेगी लाखों रुपये, सुप्रीम कोर्ट में है मामला, जानें क्या है इसका मध्यप्रदेश कनेक्शन
Sun, 23 Aug 2020 02:10 PM IST
अमर शर्मा
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Sun, 23 Aug 2020 02:10 PM IST
सार
- मोटर वाहन अधिनियम की धारा 41.2 के अनुसार, राज्य सरकार मोटर वाहन रजिस्ट्रेशन के लिए केंद्र सरकार द्वारा तय की गई फीस से ज्यादा नहीं ले सकते।
- फैंसी नंबर की नीलामी भी इस के धारा के अनुसार नहीं की जा सकती।
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- फोटो : For Reference Only
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में यदि एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट स्वीकार कर ली तो वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबर प्लेट की लाखों रुपए की नीलामी बंद हो सकती है। खास नंबर वाली प्लेट कुछ सौ रुपयों की साधारण रजिस्ट्रेशन फीस में ही उपलब्ध हो जाएगी।
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मोटर वाहन अधिनियम की धारा 41.2 के अनुसार, राज्य सरकार मोटर वाहन रजिस्ट्रेशन के लिए केंद्र सरकार द्वारा तय की गई फीस से ज्यादा नहीं ले सकते। फैंसी नंबर की नीलामी भी इस के धारा के अनुसार नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट में यह बात एमिकस क्यूरी ने अपनी रिपोर्ट में कही है। एमिकस ने यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दायर की है।
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एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज स्वरूप ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मोटर वाहन एक्ट, 1988 की धारा 41.2 के अनुसार वाहन के रजिस्ट्रेशन के लिए राज्य सरकार वही फीस ले सकती है, जो केंद्र सरकार तय करेगी। राज्यों को रजिस्ट्रेशन नंबर देने के लिए केंद्र द्वारा तय की गई फीस से अधिक फीस लेने का अधिकार नहीं है।
उन्होंने कहा कि एक्ट की धारा 211 में राज्य को जो फीस तय करने अधिकार दिया गया है, वह वाहन के रजिस्ट्रेशन से संबंधित नहीं है। यह फीस अर्जियों, दस्तावेजों में सुधार, प्रमाणपत्र, लाइसेंस, परमिट, टेस्ट, बैज, प्लेट, काउंटरसाइन, दस्तावेज और आदेशों की प्रतियां अन्य सेवाएं देने के लिए है।
उसमें भी केंद्र सरकार चाहे तो किसी सेवा के बदले में लिए जाने वाले शुल्क को समाप्त कर सकती है, जिसे राज्य सरकार मानने के लिए बाध्य होगी। एमिकस ने 23 पन्नों की रिपोर्ट में कहा कि राज्य की वाहन पंजीकरण अथॉरिटी वाहन को पंजीकरण का नंबर देती है। इसकी फीस पूरे देश में एक समान है।
मध्यप्रदेश का है मामला
मामला मध्यप्रदेश का है, जहां वाहन रजिट्रेशन की फीस ज्यादा इसलिए ली गई, क्योंकि रजिस्ट्रेशन नंबर सामान्य से अलग था। वाहन मालिक ने कहा कि उसने इस नंबर की मांग नहीं की थी। ये नंबर उसे क्रमानुसार खुद ही मिला है, लेकिन अथॉरिटी ने कहा कि उसे अलग से शुल्क देना होगा, क्योंकि ये (एमपी के एल - 4646 ) नंबर खास तरह का है। मालिक ने फीस देने से इनकार कर दिया। मामला हाई कोर्ट गया। उच्च न्यायालय ने अथॉरिटी के आदेश को गलत मानते हुए कहा कि उसे इस नंबर के लिए अधिक पैसा लेने का अधिकार नहीं है।
मामला मध्यप्रदेश का है, जहां वाहन रजिट्रेशन की फीस ज्यादा इसलिए ली गई, क्योंकि रजिस्ट्रेशन नंबर सामान्य से अलग था। वाहन मालिक ने कहा कि उसने इस नंबर की मांग नहीं की थी। ये नंबर उसे क्रमानुसार खुद ही मिला है, लेकिन अथॉरिटी ने कहा कि उसे अलग से शुल्क देना होगा, क्योंकि ये (एमपी के एल - 4646 ) नंबर खास तरह का है। मालिक ने फीस देने से इनकार कर दिया। मामला हाई कोर्ट गया। उच्च न्यायालय ने अथॉरिटी के आदेश को गलत मानते हुए कहा कि उसे इस नंबर के लिए अधिक पैसा लेने का अधिकार नहीं है।