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शरद पूर्णिमा 13 अक्तूबर को, औषधियों के अमृतत्व प्राप्ति का दिन

Sat, 05 Oct 2019 04:36 PM IST
विनोद शुक्ला पं. जयगोविंद शास्त्री
पं. जयगोविंद शास्त्री Published by: विनोद शुक्ला Updated Sat, 05 Oct 2019 04:36 PM IST
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sharad purnima importance and significance

चंद्रमा का अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होने तथा तपश्चर्या के प्रभाव से पच्चीस करोड़ वर्ष की आयु प्राप्त कर चुके 'अगस्त' तारे के उदय का दिन शरद पूर्णिमा 13 अक्टूबर रविवार को है। इस दिन चंद्रमा पूर्ण कांतिमय होकर अपनी शीतल किरणों से फसलों पेड़-पौधों तथा वनस्पतियों पर अमृत वर्षा करते हैं चंद्रमा की इन्हीं किरणों के प्रभाव से इनमें अमृत्व का प्रभाव आ जाता है और ये जीवन दायिनी होकर जीव जगत को आरोग्य प्रदान करती हैं। चंद्रमा की यही पूर्ण आभा संसारिक प्राणियों में अधिक अनुराग उत्पन्न करते हुए जड़ता में भी चेतनता का भाव उत्पन्न कर देती है।

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शरद पूर्णिमा का महत्व

- आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के मध्य जब भगवान विष्णु शयन मुद्रा में होते हैं तो पृथ्वी पर भुखमरी, दरिद्रता व सूखे की देवी 'अलक्ष्मी' का साम्राज्य रहता है इन्हीं के साथ प्रलय के अन्य तीन देवता, ज्वर-बुखार जन्य रोंगों के स्वामी रूद्र, भूस्खलन बाढ़ और सूखे के स्वामी वरुण तथा अनेक रोंगों, दुर्घटनाओं एवं अकाल मृत्यु के स्वामी यम का पृथ्वी पर तांडव रहता है। इस अवधि में देवप्राण कमजोर पड़ जाते हैं और आसुरी शक्तियों का वर्चश्व बढ़ जाता है परिणाम स्वरुप पृथ्वी पर अधिक पाप बढ़ जाते हैं।
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- शक्ति आराधना का पर्व नवरात्रि के नवें दिन मां सिद्द्धिदात्री की आराधना करके जब दशमी तिथि को व्रत पारण होती है,तो अगले ही दिन विष्णुप्रिया 'पापांकुशा' एकादशी के दिन मां लक्ष्मी पापों पर अंकुश लगाना आरम्भ देती हैं। 
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- पूर्णिमा के ही दिन जब भगवान कृष्ण अपनी नौ लाख गोपिकाओं के साथ स्वयं के ही नौलाख अलग-अलग गोपों के रूप में महारास कर रहे होते हैं तो मां महालक्ष्मी पृथ्वी पर घर-घर जाकर सबको दुःख दारिद्रय से मुक्ति का वरदान देती हैं किन्तु जिस घर के सभी प्राणी सो रहे होते हैं वहां से 'लक्ष्मी' दरवाजे से ही वापस चली जाती है। तभी शास्त्रों में इस पूर्णिमा को 'कोजागरव्रत' यानी कौन जाग रहा है व्रत भी कहते हैं। इसदिन रात्रि में की गई लक्ष्मी पूजा सभी कर्जों से मुक्ति दिलाती हैं। अतः शास्त्र इस शरदपूर्णिमा को 'कर्जमुक्ति' पूर्णिमा भी कहते हैं। 

- रात्रि में मां लक्ष्मी की षोडशोपचार विधि से पूजा करके 'श्रीसूक्त' का पाठ, 'कनकधारा स्तोत्र', विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ अथवा भगवान् कृष्ण का 'मधुराष्टकं' का पाठ ईष्टकार्यों की सिद्धि दिलाता है पूजा में मिष्ठान, मेवे और खीर का भोग लगाएं, रात्रि में ही बड़े पात्र में खीर बनाकर खुले आसमान में अथवा छत पर रखें।

- पौराणिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि में चंद्रमा की सोलह कलाओं से अमृत वर्षा होने पर ओस के कण के रूप में अमृत बूंदें खीर के पात्र में भी गिरेंगी जिसके फलस्वरूप यही खीर अमृत तुल्य हो जायेगी, जिसको प्रसाद रूप में ग्रहण करने से प्राणी आरोग्य एवं कांतिवान रहेंगे।


शरद पूर्णिमा पर उपाय
खीर में मिश्रित दूध, चीनी और चावल के कारक भी चंद्रमा ही हैं अतः इनमें चंद्रमा का प्रभाव सर्वाधिक रहता है जिसके परिणाम स्वरूप किसी भी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा क्षीण हों, महादशा-अंतर्दशा या प्रत्यंतर्दशा चल रही हो या चंद्रमा छठवें, आठवें या बारहवें भाव में हो तो चन्द्रमा की पूजा करते हुए स्फटिक माला से ॐ सों सोमाय मंत्र का जाप करें ऐसा करने से चंद्रजन्य दोष से शान्ति मिलेगी।

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