होली से पहले अब ग्रह हुए नाराज नहीं होंगे कोई भी शुभ काम, ये है वजह
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होली जलाने और खेलने के रूप में उत्सव भले ही फाल्गुन पूर्णिमा और चैत्र प्रतिपदा को मनाया जाता है। लेकिन शुरुआत सात दिन पहले और धुलैंडी के लिहाज से आठ दिन पहले से हो जाती है होलाष्टक के रुप में, जो इस वर्ष 16 मार्च को है।
परंपरा है कि होलाष्टक से रंग खेलने के दिन यानी धुलैंडी तक होलाष्टक मनाया जाएगा। इस दौरान होली के चरित्र नायक और इष्ट आराध्य की भूमि मथुरा, वृंदावन समेत ब्रज का चप्पा-चप्पा रंग, अबीर और गुलाल से रंग-बिरंगा हो उठता है। लेकिन यह आठ दिन अशुभ माना जाता है और इस बीच कई काम हैं जो नहीं करने चाहिए ऐसा कहा जाता है। इसकी वजह क्या है अब यह जान लीजिए।
होली से पहले अब ग्रह हुए नाराज नहीं होंगे कोई भी शुभ काम, ये है वजह
वह विष्णु का अनन्य भक्त था। भगवत कीर्तन में लगे रहते देख पिता ने अपने रास्ते पर लाने के कई प्रयास किए पर कामायाबी नहीं मिली। कई बार प्रहलाद को मृत्यु दंड भी मिला किन्तु नारायण भक्ति का प्रभाव था कि काल प्रहलाद का जीवन नहीं हर सका।
उनकी बहन होलिका को ब्रह्मा द्वारा वरदान था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती, इसी वरदान के अहंकार में होलिका ने भाई को सलाह दी कि वह प्रहलाद को जलती अग्निचिता पर अपनी गोद में लेकर बैठ जाएगी तो वह ब्रह्मा के वरदान के कारण बच जाएगी मगर प्रह्लाद जलकर भस्म हो जाएगा। दैत्यराज अपनी बहन होलिका की सलाह को सहमति दे दी।
ऐसी मान्यता है कि यह निर्णय फाल्गुन शुक्लपक्ष अष्टमी को दिया गया और उसी दिन से तृण-काष्ट इकट्ठा कर चिता तैयार की जाने लगी। भक्ति अवतार पर आए इस संकट से ग्रह भी हिरण्यकश्यप से क्रोधित और उग्र हो गए।
तभी से अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक के मध्य अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध एवं चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु उग्र रूप लिए माने जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सभी शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।
पूर्णिमा को जब होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती चिता पर बैठी तो ब्रह्मा जी का वरदान भी निष्फल हो गया। होलिका स्वयं भस्म हो गई प्रह्लाद बच गए। जिसकी खुशी में वैष्णव भक्तों ने भगवतभक्ति की जीत की खुशी में उस चिता की राख को त्रिपुंड स्वरूप लगाए और चारों ओर रंग गुलाओं का उत्सव आरंभ हो गया।
इस अवधि के मध्य सभी ग्रह उग्र हो गए थे, जिससे इन आठ दिनों के मध्य, गृह प्रवेश, शादी-विवाह एवं सोलह संस्कारों को वर्जित माना गया है इसे ही होलाष्टक कहते हैं।