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फलित विचार: कुंडली में कैसे बनता है कर्ज में डूबे रहने का योग ? समझिए

Thu, 28 Oct 2021 12:35 PM IST
शशि सिंह ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला Published by: शशि सिंह Updated Thu, 28 Oct 2021 12:35 PM IST
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kundli me karj yog these yog in kundali makes you stuck in debt
जानिए कुंडली के कौन से योग बनाते हैं कर्जदार (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : self

वर्तमान समय में मनुष्य अनेक परेशानियों से जूझ रहा है और उन्ही में से एक है कर्ज, आम बोलचाल की भाषा में कर्ज को मर्ज कहा जाता है। एक बार व्यक्ति कर्ज में डूबा तो वो फिर उसमें डूबता ही चला जाता है।ज्योतिष में ऐसे अनेक सूत्र हैं जिनके माध्यम से व्यक्ति की जन्मकुंडली में कर्ज का पता चलता है। इस लेख में हम उन्ही कुछ सूत्रों के बारे में चर्चा करेंगे। ज्योतिष में दूसरे भाव में धन का, ग्यारहवें भाव से लाभ का और छठे भाव से कर्ज का पता चलता है। 

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दूसरे भाव और लाभ भाव का अगर आपस में परिवर्तन हो यानी धन का स्वामी लाभ में और लाभ का स्वामी धन में बैठा हो तो ये लक्ष्मी योग बनता है। ऐसा व्यक्ति धनवान होता है लेकिन अगर छठे भाव की स्थिति कमजोर हुई तो उसे नौकरी, कर्ज संबंधी समस्या रहती है। 

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1 - अगर किसी कुंडली में नीच का पाप ग्रह छठे भाव में हो और लग्नेश दुर्बल हो तो ऐसा व्यक्ति कर्ज का शिकार होता है। अगर मारकेश छठे भाव में सम्बन्ध बना रहा तो तो मुमकिन है कि बीमारी के लिए जातक कर्ज ले। यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि सूत्र में पाप ग्रह नीच राशि में ही होना चाहिए। छठे भाव में सूर्य, मंगल और राहु जैसे ग्रह शुभ फल कारक माने गए है। ये व्यक्ति के शत्रु का नाश करते है लेकिन अगर ग्रह नीच है और पीड़ित है तो वो व्यक्ति को शुभ फल नहीं देता है। 

2 - छठे भाव में ग्रहण योग हो और धन, लाभ के स्वामी पीड़ित हो तो भी जातक कर्ज में जाता है। दरअसल राहु-सूर्य, सूर्य-मंगल, सूर्य-केतु जैसे पाप ग्रह अगर छठे भाव में युति करे तो वो उस भाव के शुभ फल में कमी करते है। उस स्थिति में ये आवश्यक हो जाता है कि धन और लाभ के स्वामी बलवान हो लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो जातक उन ग्रहों की दशा में अवश्य ही कर्जदार होगा। 

3- छठे भाव का स्वामी खुद कमजोर हो और छठे भाव में शनि राहु, शनि मंगल या शनि केतु की युति हो तो भी यह योग बनता है। दरअसल छठे भाव को उपचय भाव यानी वृद्धि का भाव कहा गया है। अगर छठे भाव का स्वामी नीच होकर केंद्र में जाए तो भाव के शुभ फल में कमी हो। वहीं शनि मंगल या शनि राहु की युति इस भाव में मनुष्य के शत्रु द्वारा धन का नाश करवाती है। शनि मंगल की युति छठे भाव में कभी भी व्यक्ति को सफल नहीं होने देती। 

4- गुरु अगर धन का स्वामी होकर राहु के साथ छठे भाव में हो और लग्नेश कमजोर हो तो भी व्यक्ति पीड़ित होता है। दरअसल गुरु जीव कारक ग्रह है और राहु के साथ युति होने पर वो गुरु चांडाल योग का निर्माण करता है। यह युति जिस भाव में होती है उसी भाव के शुभ फल में कमी आ जाती है। राहु छल का कारक है और छठा भाव शत्रु का, अगर गुरु धन का स्वामी होकर छठे में बैठे और राहु भी वही हो तो ऐसे व्यक्ति का धन छल कपट से लूट लिया जाता है और वो कर्ज में डूबता है।  

पं. मनोज कुमार द्विवेदी 
 ज्योतिषाचार्य कानपुर 

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