बचपन में स्कूल की किताबों में देखा गया दुनिया का नक्शा शायद दुनिया की बिल्कुल सही तस्वीर नहीं दिखाता था। खासकर मर्केटर प्रोजेक्शन वाले नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ्रीका का आकार लगभग एक जैसा दिखाई देता है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ 37 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि ग्रीनलैंड करीब 21.7 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। यानी अफ्रीका, ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना बड़ा है।
अब संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया के नक्शे को लेकर हुई एक अहम बहस ने एक बार फिर इस मुद्दे को चर्चा में ला दिया है। 4 सितंबर 2026 को हुए मतदान में 164 देशों ने उस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसमें दुनिया के ऐसे नक्शा प्रोजेक्शनों को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जो महाद्वीपों और देशों के क्षेत्रफल को ज्यादा सही अनुपात में दिखाते हैं। अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि कुछ देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। प्रस्ताव टोगो की ओर से पेश किया गया था।
आखिर मर्केटर मैप में ग्रीनलैंड इतना बड़ा क्यों दिखता है?
इस कहानी की शुरुआत करीब 450 साल पहले होती है। साल 1569 में जर्मन-फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने एक ऐसा मानचित्र प्रोजेक्शन तैयार किया, जिसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के देशों का वास्तविक क्षेत्रफल दिखाना नहीं, बल्कि समुद्री यात्राओं को आसान बनाना था।
मर्केटर प्रोजेक्शन में दिशा और कोणों को इस तरह संरक्षित किया गया कि समुद्री यात्रियों के लिए रास्तों की गणना करना आसान हो सके। यही वजह थी कि यूरोपीय समुद्री शक्तियों ने इसका इस्तेमाल अपने नॉटिकल चार्ट्स में बड़े पैमाने पर किया।
समय के साथ यह प्रोजेक्शन एटलस, स्कूलों की किताबों, दीवारों पर लगे वर्ल्ड मैप और बाद में डिजिटल मैपिंग तक पहुंच गया।
लेकिन इसकी एक बड़ी सीमा थी। यह क्षेत्रफल की तुलना के लिए उपयुक्त नहीं था।
जैसे-जैसे भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ते हैं, मर्केटर प्रोजेक्शन में जमीन का आकार वास्तविकता से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है। यही कारण है कि ग्रीनलैंड जैसे उत्तरी अक्षांशों में स्थित भूभाग नक्शे पर वास्तविक आकार से बहुत बड़ा नजर आता है, जबकि भूमध्य रेखा के आसपास स्थित अफ्रीका अपेक्षाकृत छोटा दिखाई देता है।
धरती गोल है, लेकिन नक्शा सपाट
नक्शे की इस समस्या की सबसे बड़ी वजह पृथ्वी का गोलाकार होना है। हमारी धरती लगभग गोल है, जबकि कागज, किताब या मोबाइल स्क्रीन सपाट होती है। इसलिए गोल पृथ्वी को सपाट सतह पर उतारते समय किसी न किसी चीज में विकृति आना तय है।
यही वजह है कि दुनिया का कोई भी सपाट नक्शा क्षेत्रफल, आकार, दूरी और दिशा, चारों को एक साथ पूरी तरह सही नहीं दिखा सकता।
मर्केटर प्रोजेक्शन ने दिशा और कोण को प्राथमिकता दी, इसलिए क्षेत्रफल में विकृति आई। इसके विपरीत कुछ दूसरे प्रोजेक्शन क्षेत्रफल को ज्यादा सही दिखाने पर जोर देते हैं।
क्या मर्केटर मैप गलत था?
मर्केटर मैप को पूरी तरह गलत कहना सही नहीं होगा। इसे जिस उद्देश्य के लिए बनाया गया था, उसके लिहाज से यह बेहद उपयोगी था। समुद्री नेविगेशन में दिशा और कोण महत्वपूर्ण होते हैं और इसी जरूरत को ध्यान में रखकर यह प्रोजेक्शन विकसित किया गया था।
समस्या तब पैदा होती है जब इसी नक्शे को देशों या महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
यही वजह है कि आज कई विशेषज्ञ और अभियान दुनिया को ऐसे नक्शों में दिखाने की वकालत करते हैं, जिनमें क्षेत्रफल का अनुपात ज्यादा वास्तविक हो।
Equal Earth Projection क्यों चर्चा में है?
इसी सोच के तहत 2018 में कार्टोग्राफर Bojan Šavrič, Tom Patterson और Bernhard Jenny ने Equal Earth Projection तैयार किया। इसका उद्देश्य दुनिया के महाद्वीपों और देशों के क्षेत्रफल को अपेक्षाकृत सही अनुपात में दिखाना है।
इस प्रोजेक्शन में अफ्रीका अपनी वास्तविक विशालता के ज्यादा करीब दिखाई देता है, जबकि ग्रीनलैंड और उत्तरी अक्षांशों के अन्य भूभाग मर्केटर प्रोजेक्शन की तुलना में छोटे नजर आते हैं।
अफ्रीका के आकार को समझने के लिए यह तथ्य काफी महत्वपूर्ण है कि उसके क्षेत्रफल के भीतर अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और पश्चिमी यूरोप के बड़े हिस्सों को रखा जा सकता है और फिर भी जगह बच सकती है।
संयुक्त राष्ट्र में क्यों उठा मुद्दा?
दुनिया के नक्शे को लेकर यह बहस सिर्फ तकनीकी नहीं है। आलोचकों का कहना है कि सदियों तक ऐसे नक्शों के इस्तेमाल से लोगों के दिमाग में दुनिया के आकार को लेकर एक गलत दृश्यात्मक धारणा बन सकती है।
अगर अफ्रीका लगातार छोटा और यूरोप या उत्तरी अमेरिका अपेक्षाकृत बड़ा दिखाई दे, तो यह अनजाने में एक तरह की visual hierarchy यानी दृश्यात्मक प्राथमिकता पैदा कर सकता है।
कुछ आलोचक इसे औपनिवेशिक नजरिए से भी जोड़ते हैं। अफ्रीकी देशों की ओर से लंबे समय से ऐसे नक्शों की मांग उठती रही है, जिनमें अफ्रीका और दूसरे क्षेत्रों का वास्तविक आकार ज्यादा सही अनुपात में दिखाई दे।
टोगो ने भी संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पेश करते हुए इसी व्यापक दृष्टिकोण पर जोर दिया। टोगो ने 2026 के अंत तक अपने स्कूलों में इस्तेमाल होने वाले नक्शों को बदलने की योजना की बात कही है।
फ्रांस की ओर से भी यह तर्क सामने आया कि सिर्फ नक्शा बदलने से दुनिया नहीं बदलेगी, लेकिन गलत दृश्यात्मक धारणा को सुधारना वास्तविकता को बेहतर ढंग से समझने की दिशा में एक कदम हो सकता है।
वहीं अमेरिका ने इस पहल की आलोचना की। अमेरिकी प्रतिनिधि की ओर से सवाल उठाया गया कि जब दुनिया के सामने कई गंभीर चुनौतियां हैं, तब 16वीं सदी के नक्शे को लेकर बहस क्यों की जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का मतलब क्या है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने मर्केटर मैप पर प्रतिबंध नहीं लगाया है।
महासभा का प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि अब दुनिया के हर स्कूल, वेबसाइट या कंपनी को अपना नक्शा बदलना होगा।
इस पहल का उद्देश्य ऐसे नक्शा प्रोजेक्शनों को बढ़ावा देना है, जो खासतौर पर क्षेत्रफल की तुलना के लिए ज्यादा उपयुक्त हों।
यानी मर्केटर प्रोजेक्शन खत्म नहीं हो रहा। जहां समुद्री नेविगेशन में दिशा और कोण महत्वपूर्ण हैं, वहां इसका इस्तेमाल आगे भी किया जा सकता है। वहीं क्षेत्रफल की तुलना के लिए Equal Earth जैसे equal-area projections ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं।
भारत के नक्शे पर क्या होगा असर?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि भारत की सीमाएं या क्षेत्रफल बदल जाएंगे।
नक्शा प्रोजेक्शन बदलने पर किसी देश की आकृति और उसका नक्शे पर दिखाई देने वाला आकार कुछ हद तक बदल सकता है, लेकिन इससे उसकी वास्तविक भौगोलिक सीमाएं नहीं बदलतीं।
भारत ने अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर अपना रुख स्पष्ट रखा है। भारत के आधिकारिक राजनीतिक मानचित्र में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों समेत देश के संप्रभु क्षेत्र को उसी आधिकारिक स्थिति के अनुसार दिखाया जाता है।
इसलिए नक्शा प्रोजेक्शन बदलना और किसी देश की अंतरराष्ट्रीय सीमा या संप्रभु क्षेत्र का चित्रण बदलना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
क्या Equal Earth दुनिया का सबसे सही नक्शा है?
इसका जवाब भी नहीं है।
क्योंकि कोई भी सपाट नक्शा ऐसा नहीं हो सकता जो एक साथ क्षेत्रफल, आकार, दूरी और दिशा को बिल्कुल सही बनाए रखे। अगर क्षेत्रफल को ज्यादा सटीक रखा जाता है तो आकृति में कुछ विकृति आ सकती है। अगर आकृति को ज्यादा सही रखने की कोशिश की जाती है तो दूरी या क्षेत्रफल प्रभावित हो सकता है।
इसीलिए पृथ्वी को सबसे वास्तविक रूप में देखने का तरीका आज भी ग्लोब है। लेकिन ग्लोब को किताब के पन्ने, मोबाइल स्क्रीन या दीवार पर इस्तेमाल करना व्यावहारिक नहीं है।
असली सवाल- कौन सा नक्शा सही है?
दुनिया के नक्शे की पूरी बहस को सिर्फ 'सही' और 'गलत' के नजरिए से देखना शायद उचित नहीं होगा।
असल सवाल यह है कि किस उद्देश्य के लिए कौन सा नक्शा सबसे उपयोगी है।
मर्केटर प्रोजेक्शन समुद्री नेविगेशन और दिशा-आधारित इस्तेमाल के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है। वहीं Equal Earth जैसे प्रोजेक्शन क्षेत्रफल की तुलना के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं।
इसलिए करीब 450 साल पुराना मर्केटर मैप अचानक झूठा साबित नहीं हुआ है। बल्कि दुनिया अब यह समझने की कोशिश कर रही है कि नक्शा सिर्फ रास्ता दिखाने का माध्यम नहीं होता, बल्कि वह यह भी तय कर सकता है कि हम दुनिया को किस नजरिए से देखते हैं।
और शायद यही वजह है कि आज की बहस सिर्फ अफ्रीका और ग्रीनलैंड के आकार की नहीं है। असली सवाल यह है कि हम दुनिया को आखिर किस नजरिए से देखना चाहते हैं।