गंगा नदी में देशी प्रजाति की मछलियों के अस्तित्व और मछुआरों की आजीविका पर मंडरा रहे संकट को देखते हुए मत्स्य विभाग, लखनऊ की एक विशेष वैज्ञानिक टीम ने टांडा कला गंगा घाट का दौरा किया। टीम ने गंगा के ऊपरी हिस्से से लेकर निचले हिस्से तक विदेशी मछलियों के बढ़ते दुष्प्रभाव का अध्ययन किया और स्थानीय मछुआरों को जागरूक किया। जांच दल का नेतृत्व कर रहे लखनऊ से आए प्रधान वैज्ञानिक डॉ. शरद कुमार सिंह ने बताया कि विदेशी प्रजाति की मछलियां, जिन्हें 'हेलिकॉप्टर मछली', 'मगरमच्छ मछली' (क्रोकोडाइल फिश), 'सकर माउथ कैटफिश' या 'बिल्ली मछली' भी कहा जाता है, गंगा के जलीय पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं। यह प्रजाति दिल्ली से लेकर गंगा के विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से फैल रही है। यह आक्रामक मछली रोहू और भाकुर जैसी मूल्यवान देशी मछलियों के अंडों और उनके बच्चों को खा जाती हैं, जिससे देशी मछलियों की संख्या में भारी गिरावट आ रही है। यदि इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया, तो मछुआरों के सामने जीवन यापन और जीविका का गहरा संकट खड़ा हो जाएगा।