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VIDEO: वैज्ञानिक तरीके से संवरेंगी धरोहरें, रामकथा संग्रहालय में बन रही कंजर्वेशन लैब में होगा वैज्ञानिक उपचार

अयोध्या। अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय में संरक्षित पांडुलिपियों, प्राचीन दस्तावेजों, धातु की मूर्तियों और अन्य ऐतिहासिक पुरावस्तुओं को अब वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किया जाएगा। इसके लिए संग्रहालय में अत्याधुनिक कंजर्वेशन लैब तैयार की जा रही है। किसी भी धरोहर को गैलरी में प्रदर्शित करने से पहले उसकी स्थिति का वैज्ञानिक परीक्षण कर जरूरी संरक्षण उपचार किया जाएगा। कंजर्वेशन विशेषज्ञों के अनुसार, किसी पुरावस्तु के संरक्षण की प्रक्रिया उसके मटेरियल, उम्र, क्षति और मौजूदा स्थिति के आकलन से शुरू होगी। सबसे पहले वस्तु का दस्तावेजीकरण किया जाएगा। इसमें उसका आकार, वजन, बनावट, दरार, टूट-फूट, नमी, जंग और अन्य क्षतियों का ब्योरा दर्ज होगा। इसके आधार पर संरक्षण की तकनीक तय की जाएगी। रामकथा संग्रहालय के निदेशक डॉ. संजीव सिंह ने बताया कि संरक्षण उपचार पूरा होने के बाद भी धरोहरों की नियमित सुरक्षा जरूरी होगी। गैलरियों में तापमान, आर्द्रता, प्रकाश और धूल को नियंत्रित रखने की व्यवस्था की जाएगी। इससे पांडुलिपियों समेत अन्य संवेदनशील पुरावस्तुओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि संरक्षण का उद्देश्य पुरावस्तुओं को नया रूप देना नहीं, बल्कि उनकी मूल पहचान और ऐतिहासिक स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए उनकी आयु बढ़ाना है। पांडुलिपियों में नमी और फंगस की होगी जांच: कागज, भोजपत्र और अन्य जैविक सामग्री से बनी पांडुलिपियों व दस्तावेजों में नमी, फंगस, कीटों से हुई क्षति और कागज की कमजोरी की जांच की जाएगी। जरूरत के अनुसार सतह की सफाई, फंगस नियंत्रण और कागज को स्थिर करने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। फटे या कमजोर पन्नों को विशेषज्ञ तकनीक से सहारा दिया जाएगा, ताकि मूल सामग्री को नुकसान पहुंचाए बिना उन्हें सुरक्षित रखा जा सके। धातु की वस्तुओं से हटाई जाएगी जंग : धातु की मूर्तियों और अन्य पुरावस्तुओं में समय के साथ जंग, धूल और दूसरी परतें जम जाती हैं। लैब में पहले धातु के प्रकार और क्षति की स्थिति का आकलन किया जाएगा। इसके बाद नियंत्रित तरीके से जंग और अवांछित परतों की सफाई की जाएगी। उपचार के बाद धातु के क्षरण की गति को कम करने के लिए संरक्षण प्रक्रिया अपनाई जाएगी। लकड़ी, वस्त्र और चित्रों का भी होगा संरक्षण : डॉ. संजीव सिंह के अनुसार, संग्रहालय में आने वाली लकड़ी, वस्त्र, चित्र और अन्य जैविक सामग्री की पुरावस्तुओं के लिए उनकी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग संरक्षण तकनीक अपनाई जाएगी। इनमें कीट, फफूंदी, नमी, दरार और संरचनात्मक कमजोरी की जांच प्रमुख होगी। पुरावस्तु के मूल स्वरूप को बनाए रखना प्राथमिकता होगी।

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