अधर्म पर धर्म की विजय और प्रभु श्रीराम की भक्ति के जयघोषों के बीच रामलीला मैदान में मेघनाद वध की लीला का मंचन हुआ। आगरा किला के सामने स्थित मैदान में हजारों दर्शक रामदल और रावण दल के बीच महासंग्राम के साक्षी बने। रथों की टक्कर, तीरों की बौछार और ढोल-ताशों की गूंज के बीच लक्ष्मण जी ने प्रभु श्रीराम का स्मरण कर मेघनाद पर निर्णायक प्रहार किया। मेघनाद के धराशायी होते ही मैदान श्रीराम और लक्ष्मण के जयघोषों से गूंज उठा। इसके बाद 90 फुट ऊंचे मेघनाद के पुतले का धमाकों के बीच दहन किया गया। पति के वियोग में सुलोचना के करुण क्रंदन ने श्रद्धालुओं की आंखें नम कर दीं। लीला का आरंभ रावण के दरबार में कुंभकर्ण वध का समाचार पहुंचने से हुआ। भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर दशानन व्यथित हो उठा। उसने अपने पुत्र मेघनाद को युद्धभूमि में जाने का आदेश दिया। इसके बाद रामलीला मैदान में युद्ध का दृश्य साकार हुआ। एक ओर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी का रथ था, तो दूसरी ओर मेघनाद का रथ। दोनों ओर से तीरों की बौछार होने लगी। मैदान में घूमते रथों और आमने-सामने डटे योद्धाओं ने युद्ध के दृश्य को जीवंत कर दिया। कुछ ही देर में दोनों सेनाएं मध्यवर्ती चबूतरे पर पहुंचीं, जहां ढोल-ताशों की गूंज के बीच महासंग्राम छिड़ गया। अंततः लक्ष्मण जी ने प्रभु श्रीराम का स्मरण कर मेघनाद पर निर्णायक प्रहार किया। इस अवसर पर पूर्व मंत्री चौधरी उदयभान सिंह, कमेटी के ताराचंद, भगवान दास बंसल, विजय प्रकाश गोयल, मुकेश जौहरी, आयुष, विनोद जौहरी आदि उपस्थित रहे।