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सुनें, वाली आसी की मशहूर ग़ज़ल 'दिन भर ग़मों की धूप में चलना पड़ा मुझे'

काव्य डेस्क, नई दिल्ली Updated Tue, 10 Oct 2017 09:59 AM IST

दिन भर ग़मों की धूप में चलना पड़ा मुझे
रातों को शमा बन के पिघलना पड़ा मुझे ठहरी ही थी निगाह कि मंज़र बदल गया
रुकना पड़ा मुझे कभी चलना पड़ा मुझे हर हर क़दम पे जानने वालों की भीड़ थी
हर हर क़दम पे भेस बदलना पड़ा मुझे रंगों के इंतिख़ाब से उकता के एक दिन
रंगों के दाएरे से निकलना पड़ा मुझे दुनिया की ख़्वाहिशों ने मेरी राह रोक ली
दुनिया की ख़्वाहिशों को कुचलना पड़ा मुझे बारिश कुछ इतनी तेज़ हुई अब के तंज़ की
गिर गिर के बार-बार सँभलना पड़ा मुझे

- वाली आसी

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