मेहबूब हो तो यूं हो,
दिल्ली का बादशाह,
दिल्लों का नूर हो।
मेहबूब हो तो यूं हो ,
निज़ामुद्दीन
की हर गली मशहूर हो।
मेहबूब हो तो यूं हो
कि जब लगे उसका बदन
तो लगे उसका है,
हाय रूह से चुराया बदन।
मेरे मेहबूब इतनी दूर मत जा
कि तेरी पसलियों के रास्ते भूल जाएं
मेरे मेहबूब इतनी देर मत ठहर
कि तेरे साथ ये सांसे भी ठहर जाएं।
(परिकल्पना, लेखन और आवाज़- अरविंद जोशी)
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