जो मुझे सुनती है आजकल
वो आवाज़
सुने, तो मत सुनना उसे।
वो कसमसाता सा अंधेरा है,
जो जिस्म से उकसके
रूह में जा ठहरा है,
कोइ खुसफुसाता जिन्न,
बिलकुल मेरी शक्ल का, मेरी अक्ल का,
जो मेरे नाम से अपने को बुलाता है
जो मेरी हर चीज़ पे अपना हक जताता है।
और शाम जाने पर,
मेरी पीठ से अपनी पीठ टिका कर,
बैठ जाता है।
और
कुछ नहीं कहता,
और, ऊंघता है कभी,
और
कभी मुस्कराता है।
मेरे हर सच की
मेरे ही मूँह, खिल्ली उड़ाता है।
उसका कहा, यकीं का ज़हरीला रेशम,
जो तुम्हें मिले कभी
तो मत बुनना उसे,
जो मुझे सुनती है आजकल,
वो आवाज़
सुने, तो मत सुनना उसे।
वो बर्फ सी सर्द आवाज़,
जो चेहरे की मेरे
हर नई दरार गिनाती है,
जो बातों के बीच भी
खुलके बुदबुदाती है,
वो कब्र सी ठहरी आवाज़,
भूलने नहीं देती किसी सूरत,
कि कलम थम रही,
फिर नब्ज़ रुकेगी,
और
एक सुबह अचानक
किसी शब्द के उस्तरे पे जाके
खुद मेरी ज़ुबां झुकेगी।
उसकी आँखें,
आइने में छिपा चोर दरवाज़ा,
जो तुम्हें दिखे कभी
तो मत छूना उसे,
जो मुझे सुनती है आजकल,
वो आवाज़
सुने, तो मत सुनना उसे।
(परिकल्पना, लेखन और आवाज- अरविंद जोशी)
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