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कितना तरुण दिख रहा... 

                
                                                         
                            कितना तरुण दिख रहा 
                                                                 
                            
तुम पर नेह का हर्ष।
एकदम सरल।
तितली।
 
न दुविधा, न शंका,
न क्या, न क्यूं।
एकदम निश्छल।
बाछी सा।
 
आता हूं  
तो कहती हो-आ गए?
जाता हूं तो
- सुनो! मत जाओ न!
 
और कभी किवाड़ की 
कनखियों में खड़ी,
मदिरा सी उफनती हो -
जाओ तुम! बस!
हम्म!
 
कितनी निर्भय दीख रही, 
तुम पर हंसी तुम्हारी।
एकदम निश्चिन्त।
सरिता।
 
न भय दारुण कल का,
न लय करुण कल की।
एकदम क्षणिका।
रुनझुन सी घंटिका।
 
डरता हूं 
तो कहती हो - मैं हूं न, कुछ नहीं होगा!
चुप होता तो - क्या हुआ?
ऐसा तो मत करो ना!
 
और कभी सूरज के 
गिर जाने पर, 
चांद उठा लाती हो सिरहाने।
तारिकाएं तर्जिनी और अंगूठे में दबा,
पूंछती-पहन लूं इन्हें एड़ियों पर?
 
किन्तु इस नगर, 
अरबों की चिमनियों में रहते-ढहते लोग,
कहो विदुषी,
है क्या संभव यहां लगाना 
ढाई अक्षरों का कुटिर उद्योग?
 
9 वर्ष पहले

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