कितना तरुण दिख रहा
तुम पर नेह का हर्ष।
एकदम सरल।
तितली।
न दुविधा, न शंका,
न क्या, न क्यूं।
एकदम निश्छल।
बाछी सा।
आता हूं
तो कहती हो-आ गए?
जाता हूं तो
- सुनो! मत जाओ न!
और कभी किवाड़ की
कनखियों में खड़ी,
मदिरा सी उफनती हो -
जाओ तुम! बस!
हम्म!
कितनी निर्भय दीख रही,
तुम पर हंसी तुम्हारी।
एकदम निश्चिन्त।
सरिता।
न भय दारुण कल का,
न लय करुण कल की।
एकदम क्षणिका।
रुनझुन सी घंटिका।
डरता हूं
तो कहती हो - मैं हूं न, कुछ नहीं होगा!
चुप होता तो - क्या हुआ?
ऐसा तो मत करो ना!
और कभी सूरज के
गिर जाने पर,
चांद उठा लाती हो सिरहाने।
तारिकाएं तर्जिनी और अंगूठे में दबा,
पूंछती-पहन लूं इन्हें एड़ियों पर?
किन्तु इस नगर,
अरबों की चिमनियों में रहते-ढहते लोग,
कहो विदुषी,
है क्या संभव यहां लगाना
ढाई अक्षरों का कुटिर उद्योग?
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