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कुछ मैंने गाए, कुछ तुमने,

                
                                                         
                            पहला पृष्ठ था गीतों का,
                                                                 
                            
कुछ मैंने गाए, कुछ तुमने,
कुछ गीत बटोई बन कर के 
खुद अपनी ठौर चले गए।
 
पहला पृष्ठ तरुण तरंगों का था,
क्या था? कुछ याद नहीं अब,
कुछ पल थे, कुछ पागलपन था,
और यौवन जैसा साथ नहीं अब।
 
पहला पृष्ठ, पहले पहल था आया,
पहली चिठ्ठी सा बावरा,
पहली बातों सा बड़बोला,
पहली बारिश सा शोर मचाता आँगन में।
 
वो, जो पहला पृष्ठ था ना? सबसे पहला,
जहाँ कहानी ना थी, शब्द ना थे,
नाम ना था कोई, बस हर्ष था।
विदुषी वह पहला पृष्ठ तुम्हारा स्पर्श था।
 
कुछ पन्ने पड़कर अब ठिठकें?
शायद बाहर गली में मेला हो,
शायद बाहर दिन भीतर से लम्बा होता हो।
 
चलो कुछ पल वहीं चलें,
जहाँ किताब का हर पृष्ठ पहला पृष्ठ होता हो।

(परिकल्पना, लेखन और आवाज- अरविंद जोशी)
9 वर्ष पहले

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