आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

यह पथ निशब्द जाता है

                
                                                         
                            यह पथ निशब्द जाता है,
                                                                 
                            
यहाँ श्रुति के पक्षि नहीं चितकारते।
 
यहाँ से पूर्व स्मृति के अगम्य खान हैं,   
जो निशा निशा निरंतर गहराते।
इन तलघरों से जीभकटी शिलाएं 
इस पथ जाती हैं। 
 
यह पथ निशब्द जाता है,
जहाँ भाव के वृक्ष नहीं लग पाते। 
 
यह निशब्द, मेरे भ्रूण का आदि नगर है।
यहाँ विकराल निर्जनी एक जीव सी,    
निमिष निमिष श्वास लेती है, 
लय विलय, 
लय विलय।   
 
यह पथ निशब्द जाता है,
जहाँ ऋतु के पथिक नहीं ठहराते।
 
वर्षा नहीं छुआती, पतझड़ 
पात नहीं बिछाते।
धूप पड़े महीनों दूब नहीं हरियाती,
नहीं फैलाती।
 
यह पथ निशब्द जाता है, 
यह पथ, वर्षों मृत शव से लगा गर्भनाल सा,   
केवल एक इकेले को ले जाता है 
 
जहाँ
नगर निशब्द, 
कोटि योजन फैला, समतल
विरोम है 
 
और उस पथ, उस नगर 
से लौटा मैं नहीं, मेरा 
विलोम है।  

(परिकल्पना, लेखन और आवाज- अरविंद जोशी)
9 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर