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कुल्लू दशहरा: तीसरे दिन भी देवी-देवताओं के अस्थायी शिविरों में पूजा-अर्चना का दौर जारी

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के तीसरे दिन शुक्रवार को ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में विराजमान देवी-देवताओं के अस्थायी शिविरों में सुबह से ही पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो गया। सुबह करीब छह बजे से विभिन्न शिविरों में ढोल-नगाड़ों, शहनाई और करनाल की गूंज के बीच पारंपरिक देव रीति-रिवाजों का निर्वहन किया गया। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज से पूरा ढालपुर मैदान भक्तिमय माहौल में सराबोर नजर आया। दशहरा उत्सव के तीसरे दिन सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही देवी-देवताओं के अस्थायी शिविरों में शुरू हो गई। श्रद्धालु अपने-अपने आराध्य देवता के शिविर में पहुंचकर विधिवत पूजा-अर्चना करते नजर आए। अलग-अलग शिविरों में बारी-बारी से पूजा-पाठ का क्रम चलता रहा। इस दौरान ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनों ने उत्सव के पारंपरिक स्वरूप को जीवंत बनाए रखा। देव समाज के लोगों ने अपनी परंपराओं के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए। शुक्रवार सुबह आनी और निरमंड क्षेत्र के देवी-देवताओं के शिविरों में विशेष नजारा देखने को मिला। यहां सुबह से ही पूजा-अर्चना और पारंपरिक धार्मिक गतिविधियां जारी रहीं। देव परंपराओं से जुड़े अनुष्ठानों के बीच श्रद्धालु अपने देवी-देवताओं के दर्शन करते रहे। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में इस वर्ष जिला भर से 312 देवी-देवता पहुंचे हैं। ढालपुर मैदान में इनके लिए अलग-अलग अस्थायी शिविर बनाए गए हैं, जहां देवी-देवता विराजमान हैं। उत्सव के तीसरे दिन भी इन शिविरों में पूजा-पाठ और पारंपरिक धार्मिक गतिविधियां जारी रहीं। कुल्लू दशहरा अपनी अनूठी देव संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए जाना जाता है। उत्सव के दौरान देवी-देवताओं की भागीदारी और पारंपरिक अनुष्ठान इसकी सांस्कृतिक पहचान को विशेष बनाते हैं।

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