हांसी के ढाणा कलां का देशी अमरूद अपने मीठे और लाजवाब स्वाद के चलते लोगों को खूब पसंद आ रहे हैं। हांसी जिला फल सब्जियों में पूरे भारत में धीरे धीरे अपनी पहचान बना रहा है। इसी के तहत अब हरियाणा के साथ-साथ दिल्ली और मुंबई की मंडियों में भी हांसी के अमरूद की मांग बढ़ रही है। स्वाद और गुणवत्ता के कारण बाजार में इनकी अलग पहचान बन रही है, जिससे अमरूद की बागवानी करने वाले किसानों का रुझान भी बढ़ रहा है। आपको बता दे कि गेहूं, धान और दूसरी परंपरागत फसलों की खेती के बीच अब किसान बागवानी की ओर भी रुख कर रहे हैं। हांसी क्षेत्र में अमरूद की खेती किसानों के लिए आमदनी का बेहतर जरिया बनती दिखाई दे रही है। देशी और आधुनिक तकनीकों के मेल से किसान अमरूद के बाग तैयार कर रहे हैं और अच्छी आमदनी हासिल करने का दावा कर रहे हैं। हांसी के ढाणा कलां से किसान संदीप फौजी ने बताया कि उसके पास कुल चार एकड़ जमीन है, जिसमें उसने अमरूद का बाग लगाया हुआ है। किसान के मुताबिक पहले इन खेतों में गेहूं और ज्वार जैसी पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं, लेकिन अमरूद का बाग लगाने के बाद उसकी आमदनी में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। किसान संदीप का कहना है कि वह अपने बाग में अमरूद की खेती को करीब 90 प्रतिशत तक ऑर्गेनिक रखने का प्रयास करता है। पेस्टिसाइड और हर्बीसाइड का इस्तेमाल बेहद कम मात्रा में किया जाता है। वह अमरूद को रोहतक और गुरुग्राम समेत दिल्ली बाहर की मंडियों में लेकर जाता है, जहां उसे अच्छे भाव मिलते है। किसान के अनुसार अमरूद की फसल साल में मुख्य रूप से दो बार आती है। गर्मी और सर्दी के सीजन में उत्पादन मिलता है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों में तीसरी फसल भी आ सकती है। किसान का दावा है कि जहां सामान्य खेती से एक एकड़ में एक लाख रुपए की आमदनी हासिल करना मुश्किल होता है, वहीं अमरूद की बागवानी से वह प्रति एकड़ सालाना एक लाख रुपये से दो लाख रुपए तक की आमदनी प्राप्त कर रहा है। बागवानी में आधुनिक सिंचाई तकनीकों के इस्तेमाल से पानी की बचत भी होती है। ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकों से सिंचाई का पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जा सकता है, जिससे पानी की खपत कम होने के साथ पौधों को बेहतर सिंचाई मिलती है। जैविक खाद और देसी तरीकों के इस्तेमाल से फल की गुणवत्ता और चमक बेहतर करने में भी मदद मिलती है। किसान ने अन्य जमींदारों और किसानों से अपील करते हुए कहा कि परंपरागत खेती के साथ-साथ बागवानी को भी अपनाया जाए। इससे आमदनी बढ़ाने के साथ जमीन की उर्वरता को बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है। उनका कहना है कि अत्यधिक रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, इसलिए किसानों को अधिक से अधिक बागवानी की ओर बढ़ना चाहिए। किसान की अपील साफ है। परंपरागत खेती के साथ बागवानी को अपनाएं, लागत और संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करें और खेती से मुनाफा बढ़ाएं।