राखीगढ़ी में खोदाई में मिली पुरातात्विक धरोहरों में मिट्टी का गोलाकार का झुनझुना शोधकर्ताओं के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है। सामान्य गेंद के आकार का मिट्टी से बना कर पकाया गया यह खिलौना पहली नजर में हर किसी को समझ नहीं आता। इसको देखने पर यह गेंद लगती है। जिसमें काफी संख्या में छोटे छोटे छेद बने हुए हैं। करीब 6500 से 7000 साल पुराने खिलौने पर शोध कार्य चल रहा है।जिसमें इसको बनाने के डिजायन पर भी शोध किया जाएगा। राखीगढ़ी में कुल 9 टीलों में से अब तक सात में ही खोदाई हो रही है।इन टीलों में खोदाई के दौरान मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, मूर्तियां, पशुओं के आकर्ति वाले खिलौने ,ईंट ,धातु के औजार सहित अन्य सामान मिला है। रिसर्च स्कॉलर इन अलग अलग वस्तुओं पर गहराई से शोध कर रहे हैं। जिसमें मिट्टी के आकार से लेकर बर्तनों पर बनी कला को लेकर शोध किया जा रहा है। गेंद के आकार के खिलौने पर भी शोध किया जा रहा है। जिसमें यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि मिट्टी का यह खिलौना बिना किसी जोड़ के किस तरह से तैयार किया गया। इसमें अंदर क्या डाला गया है ,इसको हिलाने पर झुनझुने जैसी छन-छन की आवाज आती है। सुराग इतने छोटे हैं कि बाद में अंदर कुछ डाला जाना संभव नहीं दिख रहा। अगर बाद में कुछ डाला गया होता तो वह इन छेद के जरिए वापस बाहर भी निकल जाता। इतिहासकार डॉ. महेंद्र सिंह बताते हैं कि यह हजारों साल पुरानी कला है। इस बारे में शोध की जरूरत है। उस समय भी बच्चों के खेलने के लिए इस तरह के झुनझुने बनाए जाते थे।धातु शायद कम रही होगी या सामान्य लोग उसे उपयोग नहीं कर पाते होंगे। इस कारण उस समय के अधिकतर बर्तन ,मूर्तियां, गहने आदि मिट्टी के मिलते हैं। इतिहास विभाग के शिक्षक बलजीत सिसाय ने कहा कि इस कलाकृति का डिजायन ही हैरत में डालने वाला है। 7 से 8 हजार साल पहले भी इस तरह की विकसित इंजीनियरिंग थी। यह पूरी तरह से सुरक्षित अवस्था में मिला है। ऐसे में हम मान सकते हैं यह काफी मजबूत भी है। मिट्टी के गहनों को लेकर शोध चल रहा है। उस समय मिट्टी के बर्तन, गहने,मूर्तियों के सबसे अधिक साक्ष्य मिले हैं। खोदाई में मिले अवशेषों पर अलग अलग स्तर पर शोध चल रहे हैं। मिट्टी का झुनझुना बनाने की डिजायन अनूठी है। यह कला सभी को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसके अंदर मिट्टी,बजरी हैं या धातु की गोलियां यह अब तक पता नहीं है। शोध कर्ता इसके डिजायन ,बनावट,इंजीनियरिंग लेकर भी शोध कर रहे हैं। -डॉ. मनोज सक्सेना, अधीक्षण पुरातत्वविद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग।