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रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून

Fri, 22 Mar 2013 05:33 AM IST
Badaun
Badaun Updated Fri, 22 Mar 2013 05:33 AM IST
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पानी घट ही नहीं दूषित भी हो रहा
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कल की सोचो-जल की सोचो, नहीं तो पड़ेगा पछताना
विश्व जल दिवस पर विशेष
बदायूं। रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून। वर्षों पुराना यह दोहा कभी नीतिवाद से प्रेरित लगता था, लेकिन आज यह सच साबित होता दिख रहा है। बढ़ते जल संकट को लेकर पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का यह कहना कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर लड़ा जाए, भविष्य में पानी के भयावह संकट की चेतावनी देते हैं। जिले में न केवल लगातार जलस्तर घट रहा है, बल्कि उसमें घातक रसायनों का प्रतिशत भी बढ़ रहा है। शहर के लोग पानी के रूप में धीमा जहर पी रहे हैं। घरेलू हैंडपंपों से मिल रहे पानी में अपशिष्ट पदार्थों का मिश्रण बढ़ रहा है। इससे ब्लड प्रेशर, पथरी, दिमाग का कमजोर होना, शरीर में दर्द, पेट के रोग, पीलिया आदि बीमारियां फैलने का खतरा बना हुआ है।
जिले में भूजल स्तर लगातार गिरने से स्थिति भयावह होती जा रही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 18 ब्लाक में से 14 को डार्क जोन की श्रेणी में रख दिया गया है। सबमर्सिबल पंप मिलने वाले पानी में भी अशुद्धि की शिकायत बढ़ती जा रही है। पहले 50-60 फीट पर ही शुद्ध जल मिल जाता था, लेकिन अब 100 से 120 फीट पर शुद्ध पानी मिल रहा है। ऐसा जलस्तर गिरने से हो रहा है। दूषित पानी से सबसे ज्यादा प्रभावित छोटे बच्चे हो रहे हैं। उनमें पेट की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। ग्रामीण अंचल के लोग पानी के लिए आज भी हैडपंपों पर निर्भर हैं। इनके बोरिंग 50 से 80 फीट गहराई तक ही हैं। लिहाजा उन्हें जो पानी मिल रहा है, उसमें टोटल डिजोल्व सोलिड (टीडीएस) की मात्रा दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। शुद्ध पानी में टीडीएस की मात्रा 200 से 300 प्रति लीटर मिली ग्राम होनी चाहिए जो बढ़कर 1000 से 2000 के घातक स्तर पर पहुंच गई है। वाटर एक्सपर्ट रामदास सिंह ने बताया कि जिले के कई इलाकों में पानी अशुद्ध है। इसका प्रमुख कारण अपशिष्ट पदार्थाें के मिश्रण का बढ़ना है।
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बढ़ रही है टीडीएस की मात्रा
पानी में अशुद्ध पदार्थों के मिश्रण को टीडीएस कहा जाता है। इसमें मुख्यत: सोडियम, मैग्नीशियम, मरकरी, नाइट्रेट, पैरागॉन आदि पदार्थ होते है। टीडीएस की मात्रा जिले में लगातार बढ़ती जा रही है। जो काफी हानिकारक है।
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दूषित पानी का स्वास्थ्य पर लंबा प्रभाव पड़ता है। इस कारण वायरल, हैपेटाइटिस, हैजा, पेचिश, डायरिया, लीवर रोग, टाइफायड, किडनी डिसआर्डर आदि रोग होने की आशंका रहती है। डॉ. कौशल गुप्ता ने बताया कि पेट की अस्सी फीसदी बीमारियां तो दूषित पानी की वजह से ही हो रही हैं।
आयरन: जल में आयरन की मात्रा सामान्य 0.3 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा हो जाती है तो उसके स्वाद में परिवर्तन हो जाता है। इससे हीमोक्रोमैरोसिस बीमारी होती है।
मैग्नीज: पेयजल में सामान्य मात्रा 0.05 मिग्रा प्रति लीटर से अधिक होने पर यह मानव शरीर को नुकसान पहुंचाता है। इससे तंत्रिका तंत्र रोग होते हैं।
फ्लोराइड: जल में 1.2 मिग्रा प्रति लीटर से अधिक मात्रा वाले जल का नियमित सेवन करने से प्लोरोसिस नामक रोग होता है। हड्डियां कमजोर होने लगती हैं।
नाइट्रेट: पीने वाले पानी में नाइट्रेट की मात्रा पचास मिग्रा प्रति लीटर से अधिक होने पर यह पीने लायक नहीं रह जाता है।
आर्सेनिक: इसकी पेयजल में सामान्य मात्रा 0.01 मिग्रा प्रति लीटर होनी चाहिए। अधिक होने पर त्वचा रोग की समस्या होने लगती है।
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क्या होती है जल की कठोरता
जल की कठोरता का मतलब जल में साबुन को खत्म करने की क्षमता को कहा जाता है। इस जल को साबुन से झाग पैदा करने केलिए अधिक पानी की आवश्यकता होती है। यह कैल्सिलम बाई काब्रोनेट, मैग्नीशियम बाई कार्बोनेट, कैल्शियम सल्फेट, मैग्नीशियम सल्फेट का मिश्रण होता है। पानी की कठोरता लगभग 50-150 मिग्रा प्रति लीटर होनी चाहिए।
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जल प्रदूषण रोकने के कानूून बेमानी
जल प्रदूषण की गंभीर समस्या को देखते हुए और प्रदूषण से बचाने के लिए वर्ष 1974 में भारतीय संसद ने वाटर प्रीवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पोल्यूशन एक्ट बनाया। इसमें केंद्रीय एवं राज्य जल बोर्ड को जल प्रदूषण नियंत्रण करने के लिए शक्तियां प्रदान की गई है। लेकिन आज यह भी जल प्रदूषण रोकने में सफल साबित नहीं हो पा रहा है।

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जल की शुद्धता के लिए भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। शहर में जहां पानी का स्तर काफी खराब है। उसे दिखवाया जाएगा और प्रदूषण मुक्त कराया जाएगा। शुद्घता के लिए हैडपंपों को सही और ओवरहेड टैंकों की सफाई कराई जाएगी।- ओमप्रकाश मथुरिया, चेयरमैन
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