Yuan Vs Dollar: इतनी आसानी से चीन खत्म नहीं कर पाएगा डॉलर का वर्चस्व, विशेषज्ञ की राय
चीन युवान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की कोशिशों में लंबे समय से जुटा हुआ है। लेकिन उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली है। चीन को इस दिशा में एक बड़ी सफलता 2016 में जरूर मिली थी, जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने स्पेशल ड्रॉविंग राइट्स (एसडीआर) बास्केट में शामिल मुद्राओं में युवान को भी जगह दे दी थी...
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चीन अपनी मुद्रा युवान को दुनिया की नंबर एक करेंसी बनाने के प्रयासों में जुटा हुआ है। वह इस कोशिश में है कि दुनिया भर के देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में युवान का हिस्सा बढ़ाएं। लेकिन डॉलर का वर्चस्व निकट भविष्य में टूटने की संभावना नहीं है। यह बात वॉल स्ट्रीट (अमेरिकी शेयर बाजार) के एक प्रमुख रणनीतिकार ने कही है।
इस सिलसिले में यह ध्यान दिलाया गया है कि चीन युवान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की कोशिशों में लंबे समय से जुटा हुआ है। लेकिन उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली है। चीन को इस दिशा में एक बड़ी सफलता 2016 में जरूर मिली थी, जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने स्पेशल ड्रॉविंग राइट्स (एसडीआर) बास्केट में शामिल मुद्राओं में युवान को भी जगह दे दी थी। उसके पहले इस बास्केट में अमेरिकी डॉलर, यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापान की मुद्रा येन शामिल थे।
एसडीआर में जगह मिलने के बाद चीन ने दुनिया भर के देशों से ऐसे व्यापार समझौते करने में अपनी ताकत झोंक दी, जिससे युवान की अंतरराष्ट्रीय पहुंच बढ़ सके। इस सिलिसेल में वह रूस, सऊदी अरब, ब्राजील, और इटली सहित कई देशों के साथ करार करने में सफल रहा है।
दूसरे देशों के साथ बातचीत में चीन दलील देता है कि अमेरिका अपनी मुद्रा डॉलर का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करता है। डॉलर के वर्चस्व के कारण ही उसे वह ताकत मिली हुई है, जिससे उसकी बात न मानने वाले देशों पर वह प्रतिबंध लगा देता है। ये प्रतिबंध इसीलिए कारगर होते हैं, क्योंकि हाल तक दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडारों में डॉलर का हिस्सा लगभग 60 फीसदी रहा है।
हाल में ऐसी खबरें हैं कि चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार में मौजूद डॉलर से बड़े पैमाने पर सोने की खरीदारी कर रहा है। उसने अपने भंडार में सोने की मात्रा हाल में काफी बढ़ा ली है। इसके बावजूद विशेषज्ञ यह नहीं मानते कि निकट भविष्य में चीन युवान को डॉलर की जगह दिलवा पाएगा।
वॉल स्ट्रीट की कंपनी एलपीएल के चीफ ग्लोबल स्ट्रेटेजिस्ट क्विंसी क्रोस्बी ने ऐसे तीन कारण बताए हैं, जिनकी वजह से डॉलर की बड़ी भूमिका बनी रहेगी। इस हफ्ते पेश एक दस्तावेज में क्रोस्बी ने कहा है कि दुनिया में नंबर एक करेंसी बनने के लिए ये तीन बातें जरूरी हैः पारदर्शिता, विश्वसनीयता और साख। क्रोस्बी के मुताबिक डॉलर के साथ ये तीनों बातें जुड़ी हैं, जबकि युवान के साथ इनमें से एक भी बात नहीं लागू होती है।
क्रोस्बी ने कहा है- ‘डॉलर एक मजबूत आधार पर टिका हुआ है। इसके साथ साख और पारदर्शिता का इतिहास जुड़ा हुआ है। इसके विरोधी ये पहलू इससे छीन नहीं सकते हैं। किंग डॉलर का अभी भी राज है और फिलहाल भविष्य जहां तक नजर आता है, वहां तक यह बना रहेगा।’
क्रोस्बी ने ध्यान दिलाया है कि दुनिया की दसरी सबसे बड़ी मुद्रा यूरो 1999 में अस्तित्व में आई थी। तब से अंतरराष्ट्रीय कारोबार में उसके जरिए भुगतान लगभग 20 फीसदी तक सीमित रहा है। इसकी वजह यूरोपियन यूनियन का विभाजित राजनीतिक एवं आर्थिक ढांचा है। येन का हिस्सा 5.5 फीसदी है। युवान का हिस्सा अभी सिर्फ 2.7 फीसदी है। यानी युवान को अभी लंबी यात्रा तय करनी होगी।