Xi Jinping at Arab summit: अमेरिका से सऊदी अरब की बढ़ी दूरी का फायदा उठा रहा है चीन
Xi Jinping at Arab summit: बीते हफ्ते चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रियाद की बहुचर्चित यात्रा की। इस दौरान आकर्षण का खास मौका चीन के साथ अरब देशों और खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्यों देशों का शिखर सम्मेलन रहा। सऊदी अरब ने इसका भव्य आयोजन किया...
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सऊदी अरब और खाड़ी देशों में चीन को पैठ बनाने का मौका अमेरिका के साथ सऊदी अरब के बढ़ते चले गए मतभेदों के कारण मिला है। कूटनीतिक विशेषज्ञों ने अपनी टिप्पणियों में ये बात कही है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका और सऊदी अरब के बीच विवाद और बढ़ा, तो पूरे पश्चिम एशिया में चीन के प्रभाव में काफी बढ़ोतरी होगी, जो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के लिए एक चिंताजनक पहलू होगा।
बीते हफ्ते चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रियाद की बहुचर्चित यात्रा की। इस दौरान आकर्षण का खास मौका चीन के साथ अरब देशों और खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्यों देशों का शिखर सम्मेलन रहा। सऊदी अरब ने इसका भव्य आयोजन किया। इसके जरिए उसने दुनिया को बताने की कोशिश की कि अब वह चीन के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को कितना महत्त्व दे रहा है।
थिंक टैंक एस्ट्रोलेब ग्लोबल स्ट्रेटेजी के संस्थापक ओलिवर बी जॉन ने एक विश्लेषण में लिखा है कि चीन के साथ अमेरिका की बढ़ रही होड़ के बीच सऊदी अरब के चीन से दोस्ती बनाने का दूरगामी परिणाम हो सकता है। इससे अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों में टकराव बढ़ने का अंदेशा है। जॉन थिंक टैंक मिडल ईस्ट इंस्टीट्यूट में नॉन रेजिडेंट स्कॉलर भी हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि सऊदी अरब और उसके पड़ोसी खाड़ी देश काफी समय से अपने कारोबार के लिए पूरब की तरफ नजर टिकाए रहे हैं।
तेल कारोबार की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम की विश्व ऊर्जा सांख्यिकी समीक्षा के मुताबिक 2021 में सऊदी अरब ने अपना 78 फीसदी तेल एशियाई देशों को बेचा। कुवैत का भी अब बड़ा बाजार एशियाई देश हैं। कतर की प्राकृतिक गैस का अब चीन एक बड़ा आयातक बन गया है।
विश्लेषकों के मुताबिक खाड़ी देशों से संबंध मजबूत होना चीन के फायदे में है। यह क्षेत्र अब उसके लिए तेल और गैस का प्रमुख स्रोत बन गया है। अब चीन अपना लगभग 50 फीसदी तेल आयात पश्चिम एशिया से करता है। सऊदी अरब के तेल का वह सबसे बड़ा आयातक बन गया है। जबकि 2012 के बाद अमेरिका के लिए सऊदी अरब के तेल निर्यात में लगातार गिरावट आई है। 2021 में तो सऊदी अरब ने जितने तेल का निर्यात किया, उसमें से सिर्फ पांच फीसदी अमेरिका गया। इन आंकड़ों के आधार पर कूटनीति विशेषज्ञों ने कहा है कि सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों के आर्थिक हित चीन के साथ जुड़ गए हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक पश्चिम एशिया के देशों में अमेरिका को लेकर संदेह का वातारण 2011 में अरब स्प्रिंग के समय से बना। 2011 में कई पश्चिम एशियाई देशों में हुई उस उथल-पुथल के प्रति अमेरिका की प्रतिक्रिया से इन देशों में नाराजगी पैदा हुई। सऊदी अरब के ठिकानों पर ईरान से हुए लगातार हमलों की अनदेखी करते हुए 2015 में जब अमेरिका ने ईरान के साथ परमाणु समझौता किया, तो उससे सऊदी अरब में बेचैनी देखी गई थी।
विशेषज्ञों के मुताबिक इन कारणों से सऊदी अरब धीरे-धीरे अमेरिका से दूर होता गया। राष्ट्रपति जो बाइडन की सऊदी प्रिंस सलमान के खिलाफ की गई टिप्पणियों ने हालात पूरी तरह बदल दिए। अब समझा जाता है कि उन सबका जवाब प्रिंस सलमान ने चीन के राष्ट्रपति की अभूतपूर्व आवभगत करके दिया है। इससे अरब दुनिया में एक नया शक्ति समीकरण उभरने की स्थिति बन गई है।