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नेपाल सरकार के खिलाफ भड़की महिलाएं, महिला सुरक्षा में लापरवाही के खिलाफ फूटा गुस्सा

Sat, 13 Feb 2021 05:15 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 13 Feb 2021 05:15 PM IST
सार

नेपाल में हर रोज छह से सात महिलाओं से बलात्कार होता है, जिनमें कुछ बच्चियां और बुजुर्ग महिलाएं भी होती हैं। इसके अलावा बहुत से मामलों की खबरें सामने ही नहीं आती हैं...

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Women protest against Nepal government, anger erupted against violence against women
Artists take part in a funeral procession during a protest staged by Womens in Kathmandu - फोटो : Agency

विस्तार

महिला सुरक्षा के प्रति सरकार की लापरवाही के खिलाफ नेपाल की महिलाओं का गुस्सा अब सड़कों पर फूट पड़ा है। एक बलात्कार और हत्याकांड के खिलाफ हफ्ते भर से जाजरकोट नाम के कस्बे में चल रहा आंदोलन शुक्रवार को राजधानी काठमांडो तक पहुंच गया। वृहत नागरिक आंदोलन के बैनर तले यहां सैकड़ों महिलाओं ने प्रदर्शन किया। इस दौरान नुक्कड़ नाटक खेले गए और कविताएं पढ़ी गईं। वक्ताओं ने कहा कि नेपाल में कभी महिलाओं के मुद्दों पर उचित ध्यान नहीं दिया गया। असंवेदनशीलता का हाल यह है कि मंत्री और ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी भी अकसर बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों पर अश्लील और सतही टिप्पणियां कर डालते हैं।

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मेडिकल छात्रा विजया खत्री ने यहां के अखबार काठमांडो पोस्ट से कहा कि अब महिलाओं के इंसाफ की यह मांग नहीं रुकेगी। 22 वर्षीय खत्री हफ्ते भर तक जाजरकोट में विरोध प्रदर्शनों में शामिल रहने के बाद शुक्रवार को काठमांडो आई थीं। उनकी तरह सैकड़ों महिलाएं देश के अलग-अलग हिस्सों से यहां के विरोध प्रदर्शन में भाग लेने आईं।
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बैताडी नाम की जगह पर बीते चार फरवरी को किशोर-वय युवती का शव पाया गया था। ये लड़की घर से स्कूल गई थी, जहां से वह वापस नहीं लौटी। पोस्टमार्टम से इस बात की पुष्टि हुई कि 12 वर्षीया उस बालिका की बलात्कार के बाद गला घोंट कर हत्या की गई थी। नेपाली मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक बैटाडी की ये घटना ढाई साल पहले हुए बहुचर्चित निर्मला पंत मामले से काफी कुछ मेल खाती है। जुलाई 2018 में 13 वर्षीया निर्मला का शव कंचनपुर में मिला था। बाद में पुष्टि हुई कि बलात्कार के बाद उसकी हत्या की गई थी। उस कांड के अपराधी आज तक पकड़े नहीं जा सके हैं। बैताडी कांड में पीड़िता के परिजनों को अंदेशा है कि इस बार भी अपराधी पकड़े नहीं जाएंगे।
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शुक्रवार के प्रदर्शन में शामिल हुईं उद्यमी और महिला अधिकार कार्यकर्ता हिमा बिष्ट ने काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘निर्मला पंत की हत्या से लेकर बैटाडी तक हमें न्याय नहीं मिला है। नेपाल में हर रोज छह से सात महिलाओं से बलात्कार होता है, जिनमें कुछ बच्चियां और बुजुर्ग महिलाएं भी होती हैं। इसके अलावा बहुत से मामलों की खबरें सामने ही नहीं आती हैं। इसीलिए आज गांव से शहर तक आवाज उठ रही है। लेकिन सत्ता में बैठे  लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।’

नेपाल पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 के वित्तीय वर्ष में बलात्कार के 2,144 और बलात्कार की कोशिश के 687 मामले दर्ज हुए। ये आंकड़ा उसके एक साल पहले 1,480 और 727 था। नेपाल पुलिस के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में बलात्कार के आठ हजार और बलात्कार की कोशिश के 3,100 से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैँ। इस दौरान घरेलू हिंसा के 60 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए।

शुक्रवार की रैली में शामिल महिलाओं ने निर्मला पंत मामले में अपराधियों को पकड़ने में नाकामी के कारण सरकार की कड़ी आलोचना की। युवा कार्यकर्ता प्रकृति भट्टराई ने कहा ‘सरकार ने हमारे साथ इंसाफ नहीं किया है। एक तरफ महिलाएं अपनी सुरक्षा को लेकर भयभीत हैं, वहीं सत्ता में बैठे लोग कड़ी सुरक्षा में रह रहे हैं। नागरिकों की रक्षा के लिए चुने गए लोगों ने नागरिकों के विश्वास को तोड़ा है। उन्होंने लोकतंत्र का मखौल उड़ा कर रख दिया है।’

सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक महिलाओं को न्याय ना मिल पाने के कई कारण हैं। पुलिस बलात्कार की शिकायत करने जाने वाली महिलाओं से असंवेदनशील ढंग से पेश आती है। ऐसे मामलों में कैसा व्यवहार किया जाए, इसकी उन्हें बिल्कुल ट्रेनिंग नहीं है। जिन मामलों में बलात्कार के बाद हत्या कर दी जाती है, उनमें भी पुलिस का ऐसा ही रुख रहता है।

कार्यकर्ताओं का आरोप है कि बलात्कार के मामलों की जांच में भी अधिकारी गंभीरता नहीं दिखाते। इन कार्यकर्ताओं के मुताबिक निर्मला पंत का मामला ही इसकी एक मिसाल है कि नेपाल की व्यवस्था ने महिलाओँ के साथ कैसा सलूक किया है।


नेपाल के राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की पूर्व आयुक्त मोहना अंसारी के मुताबिक महिलाओं के खिलाफ हिंसा नेपाली समाज की जड़ों तक बैठी हुई है। जब महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों से निपटने की बात आती है, तो राजनीतिक दल और सरकारी मशीनरी का रुख उदासीन रहता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन्हीं वजहों से महिलाओं की सहनशीलता अब जवाब दे गई है और उनका गुस्सा सड़कों पर दिख रहा है।

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