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रिपोर्ट: महिलाएं आंखें देखकर किसी व्यक्ति की सोच पढ़ने में पुरुषों से आगे

Wed, 28 Dec 2022 05:24 AM IST
Jeet Kumar एजेंसी, वाशिंगटन।
एजेंसी, वाशिंगटन। Published by: Jeet Kumar Updated Wed, 28 Dec 2022 05:24 AM IST
सार

 भारत सहित 57 देशों के तीन लाख से ज्यादा लोगों पर किए गए शोध में पाया गया है कि सभी उम्र और अधिकांश देशों में महिलाओं ने 'रीडिंग द माइंड इन द आइज' नामक परीक्षण में पुरुषों के मुकाबले अधिक स्कोर किया।

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Women ahead of men in reading a person's mind by looking into the eyes
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay

विस्तार

महिलाएं आंखों से किसी व्यक्ति की सोच पढ़ने में पुरुषों से आगे हैं। प्रोसिंडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइसेंस (पीएनएएस) में प्रकाशित एक शोध में यह खुलासा हुआ है। यह अब तक का सबसे बड़ा अध्ययन हैं। इसमें कहा गया है कि दुनियाभर में महिलाएं आंखें पढ़कर विचारों या भावनाओं का आकलन करने में पुरुषों की तुलना में बेहतर हैं। 

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हालांकि पुरुष भी ऐसा करते हैं, लेकिन औसत स्कोर के स्तर पर महिलाएं आगे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि पहली बार महिलाओं को संज्ञानात्मक सहानुभूति (कॉग्निटिव इंपैथी) का लाभ मिलता है।  भारत सहित 57 देशों के तीन लाख से ज्यादा लोगों पर किए गए शोध में पाया गया है कि सभी उम्र और अधिकांश देशों में महिलाओं ने 'रीडिंग द माइंड इन द आइज' नामक परीक्षण में पुरुषों के मुकाबले अधिक स्कोर किया। यह परीक्षण संज्ञानात्मक सहानुभूति को मापता है। इसका मतलब दूसरे व्यक्ति की सोच या भावनाओं को समझने की क्षमता।
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ऐसे किया जाता है परीक्षण
दशकों से शोधकर्ता शैशवावस्था से लेकर वृद्धावस्था (16 से 70 साल की उम्र) तक 'मन के सिद्धांत' के विकास का अध्ययन किया है। 'रीडिंग द माइंड इन द आइज' परीक्षण के लिए सामान्य तौर पर इस सिद्धांत का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें प्रतिभागियों को तस्वीर में दिख रहे व्यक्ति की आंख देखकर उसकी सोच या भावनाओं का वर्णन करने वाले सबसे अच्छे शब्द को चुनने को कहा जाता है। शोध में शामिल हर प्रतिभागी को मानव चेहरे की आंखों के 36 चित्र दिखाए गए। उन्हें यह बताने के लिए कहा जाता है कि व्यक्ति क्या महसूस कर रहा है। 
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सबसे पहले 1997 में आइज टेस्ट
कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सर साइमन बैरन-कोहेन और उनकी शोधकर्ताओं की टीम ने 1997 में सबसे पहले 'आइज टेस्ट' यह परीक्षण किया था। 2001 में इसे संशोधित किया गया था। आइज टेस्ट 'मन के सिद्धांत' के बेहतर मूल्यांकन के लिए सबसे मुफीद जरिया बन गया। यह अमेरिका में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ की ओर से 'अंडरस्टैंडिंग मेंटल स्टेटस' में व्यक्तिगत अंतर को मापने के लिए दो प्रमुख परीक्षणों में एक के रूप में सूचीबद्ध है।

महिलाओं ने हमेशा किया अधिक स्कोर
कैंब्रिज विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सा विभाग के अध्ययन के प्रमुख लेखक डेविड एम ग्रीनबर्ग ने कहा कि कॉग्निटिव इंपैथी दशकों से मनोविज्ञान अनुसंधान का एक विषय है। यह बचपन से शुरू होता है और बुढ़ापे तक बना रहता है। पिछले कई शोध में महिलाओं ने कॉग्निटिव इंपैथी को मापने के लिए डिजाइन किए गए परीक्षणों में पुरुषों की तुलना में अधिक स्कोर किया है।महिलाओं ने 36 देशों में किए गए परीक्षण में पुरुषों से ज्यादा और 21 देशों में उनके बराबर स्कोर किया। 

अतिरिक्त टेस्टोस्टेरोन से कम होती है सहानुभूति
वैज्ञानिकों ने पहले अनुमान लगाया था कि संज्ञानात्मक सहानुभूति में लिंग अंतर बॉयोलॉजिकल या सामाजिक कारकों का नतीजा हो सकता है। इससे पहले किए गए अध्ययन में बैरन-कोहेन और उनके सहयोगियों ने दिखाया था कि अतिरिक्त टेस्टोस्टेरोन सहानुभूति को कम करता है। 


कैंब्रिज विश्वविद्यालय में टीम के एक अन्य सदस्य कैरी एलीसन ने कहा, नए परिणाम स्पष्ट रूप से देशों, भाषाओं और उम्र के बीच लिंग अंतर को प्रदर्शित करते हैं। यह उन सामाजिक या बॉयोलॉजिकल कारकों पर भविष्य के शोध के लिए प्रश्न उठाता है, जो इन अवलोकनों में योगदान दे सकते हैं।

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