Climate Change: जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कुल मिला कर आखिर क्या हासिल हुआ कॉप-27 से?
Climate Change: जर्मनी की विदेश मंत्री एनालीना बेयरबॉक ने कहा है- ‘यह देख कर परेशानी महसूस हुई कि सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश और तेल उत्पादकों ने फॉसिल ऊर्जा का उपयोग चरणबद्ध ढंग से घटाने की योजना पर बात आगे नहीं बढ़ने दी।’
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जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के 27वें सम्मेलन (कॉप-27) में जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) का उपयोग खत्म करने के लक्ष्य पर समझौता नहीं हो सका। पेट्रोलियम उत्पादों और कोयला को जीवाश्म ईंधन कहा जाता है। कॉप-27 यहां रविवार को खत्म हो गया। आरोप है कि इस दौरान जीवाश्म ईंधन के कारोबार से जुड़ी कंपनियों ने तगड़ी लॉबिंग की, जो आखिर में कामयाब रही। ऐसे में सफलता के तौर पर यही बात बताई गई कि लगभग 200 देशों के यहां आए प्रतिनिधि ‘लॉस एंड डैमेज’ के प्रावधान पर सहमत हो गए। इसके तहत धनी देश भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से गरीब देशों को होने वाली नुकसान की भरपाई करने पर राजी हुए हैं।
कॉप-27 में औद्योगिक युग शुरू होते समय धरती का जितना तापमान था, उसे 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न बढ़ने देने का संकल्प फिर जताया गया। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक यह संकल्प बेमायने हैं। कार्बन उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत फॉसिल फ्यूल हैं। जब तक उनका उपयोग निर्णायक रूप से नहीं घटाया जाता, ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकना संभव नहीं होगा। कार्बन उत्सर्जन ही ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण हैं।
जर्मनी की विदेश मंत्री एनालीना बेयरबॉक ने कहा है- ‘यह देख कर परेशानी महसूस हुई कि सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश और तेल उत्पादकों ने फॉसिल ऊर्जा का उपयोग चरणबद्ध ढंग से घटाने की योजना पर बात आगे नहीं बढ़ने दी।’ रविवार को सम्मेलन खत्म होने से पहले उसे संबोधित करते हुए यूरोपियन यूनियन के जलवायु प्रमुख फ्रांस टिमरमैन्स ने भी कहा था कि कॉप-27 के नतीजों से वे मायूस हैं।
इसके पहले शनिवार को ईयू के अधिकारी सम्मेलन से वाक आउट कर गए थे। तब उनकी मांग थी कि सम्मेलन में धरती के तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का संकल्प दोहराया जाए। उसके पहले तक इसको लेकर बातचीत में गतिरोध बना हुआ था। आखिरकार रविवार को सभी मौजूद देशों के बीच अंतिम घोषणापत्र में इस लक्ष्य को शामिल करने पर सहमति बनी। विश्लेषकों के मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों- अमेरिका और चीन इस लक्ष्य को शामिल करने को लेकर उत्साहित नहीं थे।
इस बीच लॉग एंड डैमेज को लेकर बनी सहमति पर भी विश्लेषकों ने सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक धनी देशों ने इसे इस शर्त पर स्वीकार किया कि इतिहास में उनके उत्सर्जन की वजह से हुई ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए आगे उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा। जबकि पिछले समझौतों में यह सहमति बनी थी कि जिन देशों ने इतिहास में ज्यादा उत्सर्जन किया है, वे उसकी भरपाई करेंगे। विकासशील देशों के यह शर्त मान लेने के बावजूद लॉस एंड डैमेज के लिए बनने वाले फंड का स्वरूप तय नहीं हो सका। इसे अगले सम्मेलन के लिए टाल दिया गया। यह भी तय नहीं हुआ कि उस फंड में कौन-सा धनी देश कितना योगदान देगा।
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि अमेरिका में हाल के चुनाव में हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत मिलने के बाद यह उम्मीद घट गई है कि अमेरिका लॉस एंड डैमेज फंड में कोई योगदान करेगा। रिपब्लिकन पार्टी जलवायु परिवर्तन को नहीं मानती। उसके दो पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद अमेरिका को जलवायु समझौतों से अलग कर लिया था।