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चीन में जबरन कराए जा रहे गर्भपात के विरोध में फिरसे फंडिंग रोकेगा अमेरिका

Wed, 17 Jul 2019 02:31 PM IST
आसिम खान वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: आसिम खान Updated Wed, 17 Jul 2019 02:31 PM IST
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Washington: US stops funding of UNFP due to forced abortions
फाइल फोटो - फोटो : सोशल मीडिया

अमेरिका ने कहा है कि वह चीन में जबरन कराए जाने वाले गर्भपात का विरोध करते हुए संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष को दी जाने वाली राशि को फिर से रोकेगा। अमेरिका के इस निर्णय के बाद संस्था ने उस पर महिलाओं के स्वास्थ्य को जोखिम में डालने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर अमेरिका ने संस्था पर चीन के साथ मिलकर जबरन गर्भपात में संलिप्त होने की बात कही है।

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यह लगातार तीसरा ऐसा साल है जब अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संस्था में राशि का योगदान करने से मना कर दिया है। यह कदम तब उठाया गया है जब ट्रंप प्रशासन अपने ईसाई देश के लिए अहम मसला बन चुके गर्भपात के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है।
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विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने मंगलवार को बताया कि विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने कहा है कि चीन की परिवार नियोजन नीतियों में अब भी जबरन गर्भपात और बिना इच्छा के नसबंदी शामिल है। अमेरिकी कानून के अनुसार इन स्थितियों में राशि को रोकने की जरुरत है।
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वही दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि वह जोर-जबरदस्ती वाली नीतियों का विरोध करता है और अमेरिका ने चीन में उसके कार्यालय का कभी निरीक्षण नहीं किया।

संस्था ने एक बयान में अमेरिका से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने का अनुरोध करते हुए कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण फैसला दुनियाभर में लाखों महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य और जिंदगियों की रक्षा करने में यूएनएफपीए के महत्वपूर्ण काम को बाधित करेगा।

चीन ने तेजी से बढ़ती अपनी आबादी पर रोक लगाने के लिए 1970 में एक बच्चे की नीति लागू की थी जिससे बड़े पैमाने पर चीन में जबरन गर्भपात और नसबंदी की गई।

कम्युनिस्ट सरकार ने 2016 में दो बच्चों की सीमा बढ़ाई थी और अभी संकेत मिल रहे है कि इस नीति को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है, चीन द्वारा 2020 में शुरू किए जाने वाले व्यापक नागरिक संहिता के मसौदे में परिवार नियोजन का उल्लेख नहीं किया गया है।


तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में 2016 में अमेरिका ने यूएनएफपीए को 6.3 करोड़ डॉलर से अधिक धनराशि दी थी। वह ब्रिटेन और स्वीडन के बाद तीसरा सबसे बड़ा दानदाता था।

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