सावधान! सुपरबग से हर साल दुनिया के करोड़ों लोग हो रहे हैं प्रभावित, एंटीबायोटिक भी बेअसर
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यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न के शोधकर्ताओं ने दस देशों में इस सुपरबग पर शोध किया है। जिसमें पता चला है कि तीन अलग-अलग प्रकार के बग तेजी से दुनिया के अस्पतालों में मौजूद हैं। इस बैक्टीरिया का नाम 'स्टेफाइलोकोकस एपीडरमाइडिस' है। यह इंसानी त्वचा पर पाया जाता है, खासकर उन बुजुर्ग रोगियों के शरीर में यह बहुतायत में पाए जाता है जो लंबे समय से अस्पताल में हैं और जिनके शरीर में कोई प्रॉस्थेटिक मटेरियल लगाया गया हो।
चौंकाने वाली बात यह है कि यह सुपरबग अस्पताल के वार्डों में इस्तेमाल किए गए हैंडवाश और सैनिटाइजर में मौजूद है। शोध में पता चला है कि हैंडवाश और सैनिटाइजर में पाए जाने वाले अल्कोहल आधारित कीटाणुनाशकों के लिए भी यह तेजी से सहनशील होते जा रहे हैं।
अगर वैश्विक आंकड़ों की बात करें तो दुनियाभर में करीब एक करोड़ लोग हर वर्ष कई तरह के सुपरबग की चपेट में आ रहे हैं जिससे उनकी अकाल मृत्यु भी हो रही है। अमेरिका में एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया (सुपरबग) से हुए गंभीर संक्रमण के लगभग 20 लाख मामले सामने आ चुके हैं। इसकी वजह से हर साल 23,000 मौत हो रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में न केवल बुजुर्ग बल्कि 50,000 नवजात भी हर वर्ष इसका शिकार हो रहे हैं।
यही नहीं भारत में यह संक्रमण की तरह फैल रहा है। नई दिल्ली में पिछले दिनों कराए गए एक फूड सर्वे में पाया गया कि 80 फीसदी सुपरबग्स भोजन के रास्ते शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। वहीं 40 फीसदी खाद्य सामग्री ऐसी थी, जिसमें भारी मात्रा में एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल किया गया था।
दूसरी ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हैदराबाद के नजदीक मेडक में काजीपल्ली झील में सबसे ज्यादा सुपरबग्स पैदा करने वाली बताया गया है। इस इलाके में करीब 300 से ज्यादा दवा कंपनियां हैं, जिनका गंदा पानी इस झील में जाता है। यही वजह है कि यहां एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया तेजी से पनप रहे हैं।
तेजी से फैल रहे इस सुपरबग पर संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन चिंतित है। यूएन सहित कई सदस्य देशों ने भारत से अपील की है कि वह मेडक पनप रहे बग पर काबू करने के लिए एहतियातन कदम उठाए। बताया गया है कि 13 दवा कंपनियों ने बग के सफाए के लिए सफाई करने का ऐलान किया है। लेकिन इस पूरे मामले को संजीदगी से लेने की जरूरत है।
समस्या इतनी विकराल हो चुकी है कि तेजी और पूरी गंभीरता से कदम उठाने होंगे। वैज्ञानिकों के मुताबिक स्वीडन की गोथेनबुर्ग यूनिवर्सिटी के शोध में पता चला कि काजीपल्ली झील और उसके आसपास दवा कंपनियों के कचरे की मात्रा बहुत ज्यादा है।
क्या होता है सुपरबग
सुपरबग उस बैक्टीरिया को कहते हैं जिन पर किसी भी एंटीबायोटिक्स का असर नहीं होता है। यही वजह है कि इसे कई बार एड्स या एचआईवी से भी बड़ा खतरा माना जाता है। दरअसल शरीर के हानिकारक बैक्टीरिया समय के साथ धीरे-धीरे दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेते हैं। ऐसा होने पर डॉक्टर्स के लिए दवाओं की मदद से उन्हें रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है। चिकित्सा जगत में ऐसे बैक्टीरिया को सुपरबग कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी विश्व में बढ़ रहे सुपरबग पर चिंता जता चुका है।
शरीर जैसे ही सुपरबग के संपर्क में आता है उसके बाद उसपर किसी भी तरह की दवा और एंटीबॉयोटिक का असर होना बंद हो जाता है। वैसे चीन के वैज्ञानिकों ने पिछले महीने एक विशेष टीके का निर्माण किया है, जिसे ऐसे बगों के लिए कारगर बताया जा रहा है। लेकिन खतरा सिर्फ दवाओं के बेअसर हो जाने का नहीं बल्कि इसका बड़ा खतरा सुपरबग का तेजी से शक्तिशाली होना है।
दुनियाभर में कई तरह के सुपरबग
दुनिया में कई तरह के सुपरबग सामने आ चुके हैं। इनमें एमआरएसए (मेथीसिलिन रेजिस्टेंट स्टैफीलोकोकस ऑरियस) सुपरबग सबसे खतरनाक माना गया है। इससे संक्रमित व्यक्ति गंभीर बीमार हो जाता है। सी डिफीकाइल इसी श्रेणी का बैक्टीरिया है। यह संक्रमित और दूषित भोजन और पानी में तेजी से फैलता है। इससे खून जहरीला हो जाता है साथ ही आंतों में भी संक्रमण का खतरा बन जाता है जिससे यह घातक हो जाता है। भारत में पाए जाने वाला एनडीएम-1 (नई दिल्ली मेटैलो-बीटा- लैक्टामेज-1) काफी खतरनाक सुपरबग है।
क्यों नहीं असर करता है सुपरबग
विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वे में यह बात सामने आई थी कि भारत में करीब 53 फीसदी लोग अपनी मर्जी से एंटीबायोटिक खाते हैं। जिसकी वजह से उनका शरीर एंटी बायोटिक्स रेसिस्टेंस हो जाता है। 1970 के आसपास सबसे पहले सुपरबग शब्द का नाम सामने आया था। तब शोधकर्ताओं ने कहा था कि यह सुपरबग पॉल्यूशन ईटिंग बैक्टीरिया के लिए इस्तेमाल होता था। लेकिन हाल के वर्षों में यह एक बड़ा खतरा बनकर दुनियाभर को अपना शिकार बना रहा है।
इलाज की तलाश
सुपरबग सिर्फ भारत या भारतीयों के लिए ही खतरा नहीं है बल्कि यह अमेरिका जैसे देश तक के लिए खतरे की घंटी बना हुआ है। मेडिकल साइंस के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है, जानकार बताते हैं कि हर एंटीबायोटिक को करीब पांच साल में अपनी बेअसरी का सामना करना पड़ता है।
मेडिकल की दुनिया से जुड़े लोगों का कहना है कि सबसे पहले एंटीबायोटिक्स की बेअसरी का पता मशहूर एंटीबायोटिक पेनिसिलिन पर पता चला था। सिर्फ तीन साल के अंदर इसे बेअसरी का सामना करना पड़ा था।
अमेरिका के स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि देश में पहली बार ऐसा सुपरबग मिला है जिस पर सभी एंटीबायोटिक्स बेअसर हैं। यही नहीं विश्व वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी थॉमस फ्रेडेन का कहना है कि वह दिन दूर नहीं जब एंटीबायोटिक पूरी तरह से दुनिया से खत्म हो जाएंगे।
बैक्टीरिया से बचने के लिए यह जरूरी
सुपरबग के खिलाफ दुनियाभर में वैज्ञानिक हर दिन शोध में जुटे हैं और वह रोज नई सूचनाओं के साथ लोगों को जागरूक कर रहे हैं। अब कुछ बातों को ध्यान में रखकर हम खुद को इस खतरनाक बैक्टीरिया की चपेट में आने से बचा सकते हैं।
हैंड वाश : सुपरबग से बचाव का सबसे अच्छा और सस्ता उपाय साफ-सफाई है। इसलिए समय-समय पर हाथ धोते रहें। खासकर खाना खाने, टॉयलेट करने या फिर किसी गंदे गेट आदि को छूने के बाद साबुन से हाथ जरूर धो लें।
इम्यूनिटी : हमेशा पौष्टिक खाना खाएं, भरपूर नींद लें, नियमित व्यायाम करें। इससे आपका इम्यून सिस्टम मजबूत रहेगा। बच्चे का समय पर वैक्सीनेशन करवाएं, जिससे उसका प्रतिरोधी तंत्र बेहतर होगा। यही नहीं इम्यून सिस्टम से आप ऐसे बैक्टीरिया से लड़ने के लिए मजबूत होंगे।
एंटीबायोटिक्स : एंटीबायोटिक ही एक ऐसी दवा है जो बैक्टीरिया के संक्रमण को खत्म करती है, लेकिन अगर आप इसका ज्यादा इस्तेमाल करेंगे तो इसका असर धीरे-धीरे खत्म होने लगेगा।
यातायात के दौरान बरतें सावधानी : सुपरबग आमतौर पर पानी और खाने के माध्यम से अधिक संपर्क में आते हैं। ऐसे में ध्यान रखें कि यदि आप ऐसे शहर या देश जा रहे हैं जहां इसका खतरा है तो इसकी सावधानी ही समझदारी है।
ध्यान रखें:
हमेशा डॉक्टरी सलाह के बाद ही एंटीबायोटिक लें। किसी भी दवा का कोर्स हमेशा पूरा करें। उसे बीच में बंद न करें। डॉक्टर्स के पुराने पर्चे के हिसाब से दवा लेकर खुद इलाज न करें। डॉक्टर्स बीमारी के हिसाब से सही एंटीबायोटिक लेने की सलाह दें। जब मरीज को बहुत ज्यादा जरूरत हो तभी एंटीबायोटिक लिखें। इंफेक्शन को रोकने का हरसंभव प्रयास करें।