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कूटनीतिक रिश्ते बनाए रखेंगे बाइडन: अफगानिस्तान में अब अपने मकसद कैसे हासिल करेगा अमेरिका?

Thu, 02 Sep 2021 03:03 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 02 Sep 2021 03:03 PM IST
सार

अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपने दूतावास बंद कर दिए हैं। इसके बदले उसने कतर में अपना कूटनीतिक मिशन कायम किया है। यानी अब अमेरिका का इरादा 1200 मील दूर स्थित अपने मिशन के जरिए अफगानिस्तान से कूटनीतिक संबंध रखने का है...

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US will maintain diplomatic relations with Afghanistan on issues of combating terrorism, protecting women rights, and humanitarian assistance
अफगानिस्तान से वापस लौटती अमेरिकी सेना - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अमेरिका ने कहा है कि आतंकवाद से मुकाबले, महिला अधिकारों की रक्षा, और मानवीय मदद के मसलों पर वह अफगानिस्तान के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखेगा। लेकिन विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि अब अफगानिस्तान में अमेरिका का एक भी राजनयिक मौजूद नहीं है। ऐसे में वह कूटनीतिक संबंध कैसे कायम रखेगा, ये सवाल अहम हो जाता है।

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अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपने दूतावास बंद कर दिए हैं। इसके बदले उसने कतर में अपना कूटनीतिक मिशन कायम किया है। यानी अब अमेरिका का इरादा 1200 मील दूर स्थित अपने मिशन के जरिए अफगानिस्तान से कूटनीतिक संबंध रखने का है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने बीते मंगलवार को अफगानिस्तान में अमेरिका के आर्थिक, सुरक्षा, मानव अधिकार संबंधी, और कूटनीतिक उद्देश्यों का जिक्र किया। उन्होंने कहा- ‘इन उद्देश्यों को प्राप्त करने का रास्ता अनंत सैनिक तैनाती नहीं है। बल्कि इन मकसदों को कूटनीतिक, आर्थिक उपायों, और दुनिया को गोलबंद करते हुए हासिल किया जाएगा।’
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लेकिन जानकारों का कहना है कि जब अफगानिस्तान में एक भी अमेरिकी राजनयिक मौजूद नहीं है, तब वहां की जनता से संपर्क बनाए कठिन होगा। सीरिया और जॉर्डन में अमेरिका के राजदूत रह चुके रॉबर्ट फोर्ड ने टीवी चैनल एनबीसी से कहा- ‘जब किसी देश में आपका दूतावास नहीं हो, तो वहां की सरकार से संपर्क रखना बहुत मुश्किल हो जाता है। अगर आप किसी बात को प्रभावित करना चाहते हैं, तो ऐसा तभी किया जा सकता है, जब आप सीधी बातचीत करें।’ लेकिन कुछ दूसरे विशेषज्ञों ने कहा है कि बिना दूतावास रखे भी किसी देश की सरकार से संपर्क रखने का अनुभव मॉडल अमेरिका के पास है। अमेरिका ने ईरान और उत्तर कोरिया में अपना दूतावास ना होने के बावजूद वहां की सरकारों से संपर्क बनाए रखा है। ऐसा अक्सर किसी तीसरे देश के जरिए किया जाता है।

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लीबिया में 2014 के बाद से अमेरिकी दूतावास नहीं है। अमेरिका ने अपने लीबियाई मिशन को ट्यूनिशिया में बना रखा है। यानी लीबिया के लिए नियुक्त अमेरिकी राजदूत ट्यूनिशिया में रहते हैं। लेकिन वहां राजदूत रह चुके पीटर बोडे ने एनबीसी से बातचीत में कहा कि अकसर लीबियाई अधिकारियों से संपर्क के लिए उनके साथ ट्यूनिशिया या किसी तीसरे देश में बैठक तय करनी पड़ती थी।

जो बाइडन प्रशासन ने यह साफ नहीं किया है कि उसका कतर स्थित अफगान मिशन कैसे काम करेगा। यह मिशन दोहा स्थित अमेरिका के कतर दूतावास से काम करेगा या उसे अल-उदीद वायु सेना अड्डे में स्थापित किया जाएगा। अल-उदीद पश्चिम एशिया में अमेरिका का सबसे बड़ा सैनिक अड्डा है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने इस हफ्ते कहा कि फिलहाल दोहा स्थित अमेरिकी ऑफिस से ही अफगान दूतावास के काम को अंजाम दिया जाएगा। उस दफ्तर का अब एक प्रमुख काम तालिबान प्रतिनिधियों के साथ संपर्क बनाए रखना होगा।

पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि काबुल में अब अमेरिकी प्रतिनिधि की उपस्थिति होगी या नहीं, इस बारे में अमेरिका ने अब तक कुछ साफ नहीं कहा है। ऐसे में मुमकिन है कि कुछ राजनयिकों को छोटी अवधि के लिए वहां भेजा जाए। अमेरिका ऐसा पहले सोमालिया में कर चुका है। लेकिन वहां 2016 में राजदूत रहे स्टीफन स्वार्ट्ज ने एनसीबी से कहा- ‘ऐसा करना आसान नहीं होता है। लोगों का कहीं जाना और तुरंत वापस आना थकाने वाला होता है। साथ ही वह उतना प्रभावशाली भी साबित नहीं होता है।’
 

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