एशिया-प्रशांत क्षेत्र: बाइडन की नई आर्थिक पहल पर उठे कई गंभीर सवाल
अमेरिका का आकलन है कि इस क्षेत्र से अमेरिका के हट जाने का फायदा चीन को मिला। क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) के जरिए उसने इस क्षेत्र से प्रगाढ़ आर्थिक संबंध बना लिए। उसके बाद उसने कॉम्प्रिहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट फॉर ट्रांसपैसिफिक (सीपीटीपीपी) में शामिल होने के लिए अर्जी दे दी...
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जापान यात्रा पर आ रहे अमेरिकी राष्ट्रपति यहां एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक नए आर्थिक ढांचे की शुरुआत करेंगे। इसके पीछे मकसद चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना है। इसके लिए अमेरिका ने इस इलाके की अर्थव्यवस्था में अपनी उपस्थिति बनाने की योजना बनाई है। नई पहल का नाम इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क (आईपीईएफ) रखा गया है। इसके तहत सप्लाई चेन को मजबूत बनाने और डिजिटल अर्थव्यवस्था के नियम तय करने की पहल की जाएगी। अमेरिका को उम्मीद है कि इससे एशियाई देशों के साथ उसका सहयोग बढ़ेगा। इस बीच अमेरिका की व्यापार प्रतिनिधि कैथरीन टाय ने स्पष्ट किया है कि नई पहल मुक्त व्यापार समझौता नहीं है। बताया जाता है कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय से अमेरिका में आम माहौल मुक्त व्यापार समझौतों के खिलाफ है। इसलिए बाइडन प्रशासन ने यह स्पष्टीकरण जारी करना उचित समझा। बाइडन ने आईपीईएफ शुरू करने इरादा पिछले अक्तूबर में ईस्ट एशिया समिट के दौरान जताया था।
अमेरिका के टीपीपी से हटने का उठाया फायदा
अमेरिका स्थित थिंक टैंक एशिया सोसायटी इंस्टीट्यूट की उपाध्यक्ष वेंडी कटलर के मुताबिक आईपीईएफ अमेरिका का ‘एशिया प्रशांत क्षेत्र से आर्थिक संबंध बनाने का माध्यम’ होगा। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से बातचीत में उन्होंने उम्मीद जताई कि इस पहल से वह खाई भर जाएगी, जो अमेरिका के ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) से खुद को अलग करने से पैदा हुई थी। इस मुक्त व्यापार समझौते से पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका को निकाल लिया था। अमेरिका का आकलन है कि इस क्षेत्र से अमेरिका के हट जाने का फायदा चीन को मिला। क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) के जरिए उसने इस क्षेत्र से प्रगाढ़ आर्थिक संबंध बना लिए। उसके बाद उसने कॉम्प्रिहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट फॉर ट्रांसपैसिफिक (सीपीटीपीपी) में शामिल होने के लिए अर्जी दे दी। सीपीटीपीपी में 11 देश शामिल हैं। यह टीपीपी का ही नया संस्करण है। विशेषज्ञों की राय है कि आईपीईएफ एक अलग किस्म की पहल है, इसलिए यह आरसीईपी या सीपीटीपीपी में अमेरिका के न होने से पैदा हुई कमी की भरपाई नहीं कर पाएगा। कई देशों को नए फ्रेमवर्क के बारे में संदेह है। बीती 11 मई को वियतनाम के प्रधानमंत्री फाम मिन्ह चिन्ह ने वॉशिंगटन स्थित एक थिंक टैंक की तरफ से आयोजित चर्चा में कहा कि आईपीईएफ के कई पहलू अभी स्पष्ट नहीं हैं।
स्वीकार करने होंगे नए नियम
सिंगापुर स्थित थिंक टैंक आईएसईएएस- यूसुफ इशहाक इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलॉ जयंत मेनन के मुताबिक आईपीईएफ में शामिल होने वाले देशों को व्यापार, श्रम मानदंडों और पर्यावरण कसौटियों के बारे में नए नियम स्वीकार करने होंगे। विकासशील देशों की नजर में यह आईपीईएफ का नकारात्मक पहलू बना रहेगा। मेनन ने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा कि आईईपीएफ में सप्लाई चेन को मजबूत बनाने के नियम शामिल किए गए हैं। यह एक तरह से सप्लाई चेन से चीन को बाहर करने की योजना है। लेकिन ऐसा होने पर वह आपूर्ति श्रृंखला भंग हो जाएगी, जिसमें आसियान देश शामिल हैं। एक सवाल यह भी उठाया गया है कि क्या बाइडन के राष्ट्रपति न रहने के बाद भी अमेरिका इस पहल पर कायम रहेगा? मेनन ने कहा- ‘इन अनिश्चितताओं के कारण ऐसी संभावना नहीं दिखती की आईपीईएफ इस क्षेत्र में ज्यादा प्रभावशाली हो पाएगा।’ अपेक्षा के मुताबिक ही चीन ने नए अमेरिकी फ्रेमवर्क की आलोचना की है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा- ‘एशिया प्रशांत क्षेत्र भू-राजनीति का शतरंज नहीं है। चीन ऐसे छोटे गुट बनाने की ऐसी सभी कोशिशों को नामंजूर करता है, जो शीत युद्ध की मानसिकता से प्रेरित हैं।’