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क्या सच में ग्रीनलैंड-पनामा नहर कब्जा सकते हैं ट्रंप: मैक्सिको की खाड़ी पर क्या मांग, US के लिए कितनी संभावना?
Fri, 10 Jan 2025 05:41 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 10 Jan 2025 05:41 PM IST
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डोनाल्ड ट्रंप।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद से ही अपनी 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (MAGA) और 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत बयानबाजी शुरू कर दी है। हालांकि, इस बार राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाने के बाद से ही उन्होंने इन नारों को घरेलू राजनीति से ज्यादा विदेश नीति के लिए इस्तेमाल किया है। इसी कड़ी में ट्रंप ने पहले कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने का प्रस्ताव देते हुए वहां के पीएम जस्टिन ट्रूडो का जमकर मजाक उड़ाया। इसके बाद वे लगातार ग्रीनलैंड, पनामा नहर को अमेरिका के कब्जे में लेने की बात कहते आए हैं। इतना ही नहीं ट्रंप ने हाल ही में मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलकर अमेरिका की खाड़ी करने का भी प्रस्ताव सामने रख दिया।ऐसे में यह जानना अहम है कि ट्रंप आखिर ग्रीनलैंड, पनामा और मैक्सिको को लेकर क्या चाहते हैं? उनकी लिस्ट में अब मैक्सिको की खाड़ी का नाम कैसे जुड़ गया? क्या ट्रंप का शासन शुरू होने के बाद अमेरिका सच में ऐसा कर सकता है? इससे पहले अमेरिका अपने इतिहास में किसी देश या किसी देश के संसाधन को हासिल करने में कब सफल रहा है? आइये जानते हैं....
आखिर ग्रीनलैंड, पनामा नहर को लेकर क्या चाहते हैं ट्रंप?
जानें क्या है ट्रंप के बयान, जिससे बढ़ी चिंता?i). पुराने बयान
ट्रंप ने अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद से ही ग्रीनलैंड और पनामा नहर पर कब्जे को लेकर कई बयान दिए हैं। उन्होंने पहले उन्होंने कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा और पूरी दुनिया में आजादी के लिए, अमेरिका को लगता है कि ग्रीनलैंड का हक और नियंत्रण बेहद जरूरी है।
वहीं, पनामा नहर पर उन्होंने कहा था कि अगर पनामा स्वीकार्य तरीके से पनामा नहर का प्रबंधन नहीं करता है तो फिर अमेरिका फिर से इस पर अपना कब्जा कर सकता है। उन्होंने कहा था कि हम पनामा नहर को 'गलत हाथों' में नहीं जाने देंगे। ट्रंप का इशारा चीन की तरफ माना जा रहा था। उन्होंने लिखा था कि पनामा नहर का प्रबंधन चीन के द्वारा नहीं किया जाना चाहिए।
ii) ताजा बयान
हाल ही में अपने मार-ए-लागो रिसॉर्ट में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह पूछे जाने पर कि क्या वह स्वायत्त डेनिश क्षेत्र (ग्रीनलैंड) या नहर पर कब्जा करने के लिए सैन्य या आर्थिक बल का उपयोग न करने का आश्वासन देंगे। इस पर उन्होंने जवाब दिया, “नहीं, मैं आपको इन दोनों में से किसी के बारे में आश्वासन नहीं दे सकता। ट्रंप ने कहा, “लेकिन मैं यह कह सकता हूं, हमें आर्थिक सुरक्षा के लिए उनकी जरूरत है।” डेनमार्क और पनामा दोनों ने ऐसे किसी भी सुझाव को खारिज कर दिया है कि वे क्षेत्र छोड़ देंगे।
हाल ही में अपने मार-ए-लागो रिसॉर्ट में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह पूछे जाने पर कि क्या वह स्वायत्त डेनिश क्षेत्र (ग्रीनलैंड) या नहर पर कब्जा करने के लिए सैन्य या आर्थिक बल का उपयोग न करने का आश्वासन देंगे। इस पर उन्होंने जवाब दिया, “नहीं, मैं आपको इन दोनों में से किसी के बारे में आश्वासन नहीं दे सकता। ट्रंप ने कहा, “लेकिन मैं यह कह सकता हूं, हमें आर्थिक सुरक्षा के लिए उनकी जरूरत है।” डेनमार्क और पनामा दोनों ने ऐसे किसी भी सुझाव को खारिज कर दिया है कि वे क्षेत्र छोड़ देंगे।
दुनिया में चिंता
ट्रंप के इस तरह सैन्य कार्रवाई और आर्थिक तौर पर कार्रवाई की बात से इनकार न करने पर डेनमार्क, फ्रांस और जर्मनी समेत दुनियाभर के नेताओं ने चिंता जताई है।
ट्रंप के इस तरह सैन्य कार्रवाई और आर्थिक तौर पर कार्रवाई की बात से इनकार न करने पर डेनमार्क, फ्रांस और जर्मनी समेत दुनियाभर के नेताओं ने चिंता जताई है।
ग्रीनलैंड को क्यों अमेरिका के कब्जे में चाहते हैं ट्रंप?
- ग्रीनलैंड स्वायत्त शासन वाला देश है। हालांकि, यह अभी भी डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा है। यानी परोक्ष रूप से यहां यूरोपीय देश डेनमार्क का ही शासन है।
- चौंकाने वाली बात यह है कि ग्रीनलैंड खुद यूरोप का हिस्सा नहीं है। यह उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का हिस्सा है और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) से करीब 5000 किमी दूर है। इस लिहाज से अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड की कूटनीतिक महत्ता बढ़ जाती है।
- ग्रीनलैंड सागर के जरिए आर्कटिक महासागर से सीधे जुड़े होने की वजह से ग्रीनलैंड का यह पूरा क्षेत्र कूटनीतिक तौर पर अहमियत रखता है। इतना ही नहीं 21 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला ग्रीनलैंड पूरे अमेरिका के करीब एक-चौथाई के बराबर है और रहने के लिए कई संभावनाओं से भरा रहा है।
- ग्रीनलैंड स्वायत्त शासन वाला देश है। हालांकि, यह अभी भी डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा है। यानी परोक्ष रूप से यहां यूरोपीय देश डेनमार्क का ही शासन है।
- चौंकाने वाली बात यह है कि ग्रीनलैंड खुद यूरोप का हिस्सा नहीं है। यह उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का हिस्सा है और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) से करीब 5000 किमी दूर है। इस लिहाज से अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड की कूटनीतिक महत्ता बढ़ जाती है।
- ग्रीनलैंड सागर के जरिए आर्कटिक महासागर से सीधे जुड़े होने की वजह से ग्रीनलैंड का यह पूरा क्षेत्र कूटनीतिक तौर पर अहमियत रखता है। इतना ही नहीं 21 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला ग्रीनलैंड पूरे अमेरिका के करीब एक-चौथाई के बराबर है और रहने के लिए कई संभावनाओं से भरा रहा है।
क्या ग्रीनलैंड को सच में खरीद सकते हैं ट्रंप?
- यह पहली बार नहीं है, जब अमेरिका ने ग्रीनलैंड को अपने अधिकार क्षेत्र में लाने की बात कही है। 1946 में अमेरिका की राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन की सरकार ने डेनमार्क को 10 करोड़ डॉलर (आज के समय में एक अरब डॉलर) के बराबर सोने में खरीदने का प्रस्ताव रखा था। तब ग्रीनलैंड को सैन्य अड्डा बनाने से जुड़ी योजनाएं बनाने की बातें सामने आई थीं। हालांकि, कई साल तक चली बातचीत के बाद भी अमेरिका को ग्रीनलैंड को खरीदने में सफलता नहीं मिली।
- एक रिपोर्ट के मुताबिक, अर्थशास्त्रियों ने ग्रीनलैंड के खनिजों और संसाधनों को देखते हुए इसकी कीमत अरबों-खरबों डॉलर तक रखी है। फाइनेंशिय टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीनलैंड की वैल्यू 1.1 ट्रिलियन डॉलर्स हो सकती है।
- वहीं कुछ और विश्लेषकों ने अलास्का को 1867 में 72 लाख डॉलर में खरीदे जाने के समझौते को आधार बनाकर ग्रीनलैंड के क्षेत्रफल के हिसाब से इसकी कीमत 23 करोड़ डॉलर आंकी है। हालांकि, इसमें महंगाई, संसाधनों की आधुनिक कीमत और भू-राजनीतिक हितों को नहीं जोड़ा गया है।
- रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को खरीदता है तो उसे यहां पर अर्थव्यवस्था और इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी विकसित करना होगा। इसके चलते अमेरिका को ग्रीनलैंड का अधिग्रहण करने के बाद खनन, ऊर्जा और सामाजिक सेवाओं में निवेश की जरूरत पड़ेगी। इस लिहाज से ग्रीनलैंड की कीत 1.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है और यह इतिहास का सबसे महंगा अधिग्रहण हो सकता है।
- इतना ही नहीं अमेरिका अगर ग्रीनलैंड को खरीदता है तो उसे यहां के 57,000 रहवासियों को स्वायत्ता हस्तांतरित करने के लिए भी मुआवजा देना होगा। नागरिक इस एवज में 1 लाख डॉलर से 10 लाख डॉलर तक की मांग कर सकते हैं। यानी अमेरिका के कुल खरीद के खर्च में 5.7 अरब डॉलर से 57 अरब डॉलर तक जुड़ सकते हैं।
- हालांकि, यह सभी आंकड़े सिर्फ आर्थिक पक्ष का हिस्सा हैं। अमेरिका को ग्रीनलैंड खरीदने के लिए के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनों, समझौतों और राजनयिक चुनौतियों से पार पाना होगा। सबसे बड़ी बात है कि स्वायत्त ग्रीनलैंड और इस पर परोक्ष तौर पर शासन कर रहा डेनमार्क खुद इसे बेचने के लिए राजी नहीं हैं। ऐसे में अमेरिका के पास इस देश को खरीदने के लिए सैन्य बल या आर्थिक गतिरोध पैदा करने के अलावा कोई चारा नहीं है। हालांकि, इस कदम से उसके नाटो और अन्य सहयोगी नाराज हो सकते हैं।
पनामा नहर में ट्रंप की क्या दिलचस्पी?
गौरतलब है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था के लिए पनामा नहर बेहद अहम है, क्योंकि अभी न्यूयॉर्क से सैन फ्रांसिस्को जाने वाले मालवाहक जहाजों को पनामा नहर के जरिए दूरी 8370 किलोमीटर पड़ती है, लेकिन अगर पनामा नहर की बजाय पुराने मार्ग से माल भेजा जाए तो जहाजों को पूरे दक्षिण अमेरिकी देशों का चक्कर लगाने के बाद सैन फ्रांसिस्को जाना होगा और ये दूरी 22 हजार किलोमीटर से ज्यादा होगी।
ट्रंप ने पनामा की सरकार पर आरोप लगाया है कि वह अमेरिकी जहाजों से पनामा नहर के इस्तेमाल के लिए ज्यादा दरें वसूल रही है। दरअसल, अमेरिका का 14 फीसदी व्यापार पनामा नहर के जरिए ही होता है। कह सकते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए ही पनामा नहर लाइफलाइन का काम करती है। अमेरिका के साथ ही दक्षिण अमेरिकी देशों का बड़ी संख्या में आयात-निर्यात भी पनामा नहर के जरिए ही होता है। एशिया से अगर कैरेबियाई देश माल भेजना हो तो जहाज पनामा नहर से होकर ही गुजरते हैं। खुद पनामा की अर्थव्यवस्था इस नहर पर निर्भर है और पनामा की सरकार को पनामा के प्रबंधन से ही हर साल अरबों डॉलर की कमाई होती है। पनामा नहर पर कब्जा होने की स्थिति में पूरी दुनिया की आपूर्ति शृंखला बाधित होने का खतरा है।
क्या पनामा नहर को वापस हासिल कर सकते हैं ट्रंप?
1977 में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और पनामा के नेता ऑस्कर टॉरिजोस के बीच कार्टर-टॉरिजोस समझौता हुआ था। पनामा नहर के नियंत्रण और सुरक्षा के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता था। समझौते के तहत 1977 से 1999 के बीच जब पनामा को नहर का नियंत्रण सौंपा जा रहा था, अमेरिका को नहर की सुरक्षा और इसके संचालन में सहयोग करने का अधिकार दिया गया था। अमेरिका यह सुनिश्चित करने के लिए कि नहर स्वतंत्र और सुरक्षित रूप से काम कर सके, किसी भी सुरक्षा संकट में हस्तक्षेप करने का अधिकार रखता था।
हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने धीरे-धीरे पनामा को नहर का पूर्ण नियंत्रण सौंपने का निर्णय लिया। 1999 में पनामा को नहर का पूरा नियंत्रण मिला, और तब से नहर पूरी तरह से पनामा के नियंत्रण में है। यह समझौता पनामा में एक बहुत बड़ी जीत मानी जाती थी, क्योंकि इसने उन्हें नहर का पूर्ण नियंत्रण सौंप दिया। हालांकि, अमेरिका में कुछ लोगों ने इसे एक गलत समझौता माना, क्योंकि वे मानते थे कि अमेरिका ने अपनी रणनीतिक संपत्ति को पनामा को दे दिया था।
इस समझौते के दो सरकारों के बीच होने की वजह से डोनाल्ड ट्रंप एकतरफा तौर पर इसे नहीं तोड़ सकते। 2014 से 2019 के बीच नहर के प्रशासक रहे योर्गे लुइस किजानो ने इस संबंध में बयान भी दिया है।
1977 में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और पनामा के नेता ऑस्कर टॉरिजोस के बीच कार्टर-टॉरिजोस समझौता हुआ था। पनामा नहर के नियंत्रण और सुरक्षा के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता था। समझौते के तहत 1977 से 1999 के बीच जब पनामा को नहर का नियंत्रण सौंपा जा रहा था, अमेरिका को नहर की सुरक्षा और इसके संचालन में सहयोग करने का अधिकार दिया गया था। अमेरिका यह सुनिश्चित करने के लिए कि नहर स्वतंत्र और सुरक्षित रूप से काम कर सके, किसी भी सुरक्षा संकट में हस्तक्षेप करने का अधिकार रखता था।
हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने धीरे-धीरे पनामा को नहर का पूर्ण नियंत्रण सौंपने का निर्णय लिया। 1999 में पनामा को नहर का पूरा नियंत्रण मिला, और तब से नहर पूरी तरह से पनामा के नियंत्रण में है। यह समझौता पनामा में एक बहुत बड़ी जीत मानी जाती थी, क्योंकि इसने उन्हें नहर का पूर्ण नियंत्रण सौंप दिया। हालांकि, अमेरिका में कुछ लोगों ने इसे एक गलत समझौता माना, क्योंकि वे मानते थे कि अमेरिका ने अपनी रणनीतिक संपत्ति को पनामा को दे दिया था।
इस समझौते के दो सरकारों के बीच होने की वजह से डोनाल्ड ट्रंप एकतरफा तौर पर इसे नहीं तोड़ सकते। 2014 से 2019 के बीच नहर के प्रशासक रहे योर्गे लुइस किजानो ने इस संबंध में बयान भी दिया है।
ट्रंप की सैन्य ताकत इस्तेमाल करने की धमकी में कितना दम
अमेरिका पहले, 1989 में जब जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तब पनामा में अपनी सेना भेजकर पनामा के नेता मैुन्युएल नोरिएगा को हटा चुका है। तब कार्टर-टॉरिजोस समझौते के तहत ही अमेरिका को पनामा में अपनी सेना रखने के अधिकार थे। हालांकि, इस घटना के बाद भी अमेरिका ने समझौते के तहत 1999 में पनामा नहर का स्वामित्व पनामा को ही सौंप दिया था।
अमेरिका के वॉशिंगटन में स्थित वुडरो विल्सन इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर्स के लातिन अमेरिका प्रोग्राम के निदेशक बेंजामिन गेडान का कहना है कि अब व्यावहारिक दृष्टि से पनामा नहर का नियंत्रण हासिल करने के लिए अमेरिका की तरफ से फिर पनामा में सेना भेजने की गुंजाइश काफी कम है।" उन्होंने कहा कि ट्रंप का रुख खास तौर पर हैरान करने वाला है, क्योंकि मुलिनो एक व्यवसाय समर्थक हैं, जिन्होंने कई ऐसी पहल की हैं, जिससे वे अमेरिका के साथ एक विशेष संबंध को प्राथमिकता देते दिखे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में पनामा चीन के काफी करीब चला गया है, जिसका मतलब है कि अमेरिका के पास मध्य अमेरिकी राष्ट्र के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाए रखने के कूटनीतिक कारण हैं।
अमेरिका पहले, 1989 में जब जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तब पनामा में अपनी सेना भेजकर पनामा के नेता मैुन्युएल नोरिएगा को हटा चुका है। तब कार्टर-टॉरिजोस समझौते के तहत ही अमेरिका को पनामा में अपनी सेना रखने के अधिकार थे। हालांकि, इस घटना के बाद भी अमेरिका ने समझौते के तहत 1999 में पनामा नहर का स्वामित्व पनामा को ही सौंप दिया था।
अमेरिका के वॉशिंगटन में स्थित वुडरो विल्सन इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर्स के लातिन अमेरिका प्रोग्राम के निदेशक बेंजामिन गेडान का कहना है कि अब व्यावहारिक दृष्टि से पनामा नहर का नियंत्रण हासिल करने के लिए अमेरिका की तरफ से फिर पनामा में सेना भेजने की गुंजाइश काफी कम है।" उन्होंने कहा कि ट्रंप का रुख खास तौर पर हैरान करने वाला है, क्योंकि मुलिनो एक व्यवसाय समर्थक हैं, जिन्होंने कई ऐसी पहल की हैं, जिससे वे अमेरिका के साथ एक विशेष संबंध को प्राथमिकता देते दिखे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में पनामा चीन के काफी करीब चला गया है, जिसका मतलब है कि अमेरिका के पास मध्य अमेरिकी राष्ट्र के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाए रखने के कूटनीतिक कारण हैं।
3. क्या मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदल सकता है अमेरिका
ट्रंप ने अपने रिजॉर्ट में ही मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलकर अमेरिका की खाड़ी करने की बात कही। ट्रंप ने फ्लोरिडा में घोषणा की, "बहुत जल्द हम बदलाव की घोषणा करने जा रहे हैं, क्योंकि वो हमारा ही है। हम मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलकर अमेरिका की खाड़ी करने जा रहे हैं। अमेरिका की खाड़ी। कितना सुंदर नाम है और यही सही है।ट्रंप ने इसकी जानकारी नहीं दी है कि वह मैक्सिको की खाड़ी का नाम कैसे और कब बदलेंगे, लेकिन उनका बयान आने के बाद, रिपब्लिकन सांसद मार्जोरी टेलर ग्रीन ने कहा कि वह मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलने के लिए जल्दी ही एक विधेयक पेश करेंगी। ट्रंप के इस दावे के बाद से ही यह सवाल उठ रहा है कि अगर किसी खाड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी एक देश के नाम से जाना जा रहा है तो क्या दूसरा देश अपने कानून में बदलाव कर उसका नाम बदल सकता है? और क्या इससे उस खाड़ी पर अधिकार किसका रहता है?
पहले जानें- मैक्सिको की खाड़ी का अधिकारी कौन?
- मैक्सिको की खाड़ी समुद्र में 16 से 20 लाख वर्ग किलोमीटर तक फैली है। ये पूर्वी मैक्सिको, दक्षिणपूर्वी अमेरिका और पश्चिमी क्यूबा के समुद्र तटों को छूती है। यह अटलांटिक महासागर और कैरीबियाई सागर के बीच एक महासागरीय बेसिन है।
- मजेदार बात यह है कि इस खाड़ी से मैक्सिको के पांच राज्यों- तमाउलिपास, वेराक्रूज, टबैस्को, कैंपेचे और युकाटन के समुद्र तट लगते हैं। वहीं, अमेरिका के भी पांच राज्य- फ्लोरिडा, अलाबामा, मिसिसिप्पी, लुइजियाना, टेक्सास के समुद्री तट इस खाड़ी पर हैं। इसके अलावा क्यूबा के पिनार डेल रियो और आर्टेमिसा प्रांत के समुद्री तट इस खाड़ी से लगते हैं।
तीन देशों से लगने वाली इस खाड़ी का नाम मैक्सिको की खाड़ी पड़ने की कहानी भी दिलचस्प है। इतिहासकारों के मुताबिक, पहली बार 16वीं शताब्दी में यूरोपीय नक्शों पर इस क्षेत्र का नाम मैक्सिको की खाड़ी हुआ। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1580 में अंग्रेज खोजकर्ता फ्रांसिस ड्रेक के कैरीबियाई अभियानों के दौरान उनके साथ मैप बनाने का काम करने वाले बैप्टिस्ट बोजियो ने अपने मैप्स में इस क्षेत्र को मैक्सिको की खाड़ी के तौर पर दिखाया। हालांकि, आगे 17वीं शताब्दी की शुरुआत में इस क्षेत्र को गल्फ ऑफ न्यू स्पेन यानी नए स्पेन की खाड़ी भी कहा गया। लेकिन बाद में अधिकतर महाद्वीपों पर इस क्षेत्र को मैक्सिको की खाड़ी ही बुलाया जाने लगा।
मैक्सिको की खाड़ी पर ट्रंप के दावों में कितना दम?
- मैक्सिको की खाड़ी को लेकर ट्रंप ने कब्जे की धमकी फिलहाल नहीं दी है। हालांकि, अगर अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद वे अगर कभी कब्जे से जुड़ा कोई आदेश देते हैं तो यह यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी जैसे संगठनों के अंतर्गत अमेरिका-मैक्सिको, अमेरिका-क्यूबा और मैक्सिको-क्यूबा के बीच अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के परिसीमन के समझौते का उल्लंघन होगा।
- ऐसे ही कुछ अन्य समझौतों और पारंपरिक चलन में इस्तेमाल होने की वजह से ट्रंप को इस खाड़ी का नाम बदलने के लिए इससे जुड़े दोनों देशों- मैक्सिको और क्यूबा को भी मनाना पड़ेगा। हालांकि, मैक्सिको के नेताओं ने क्षेत्र का नाम बदलने से जुड़ी किसी भी संभावना से इनकार किया है।
- इतना ही नहीं, अगर ट्रंप को मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलवाना होगा तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय हाइड्रोग्राफिक संगठन, समुद्र के कानून तय करने वाला- यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी और भौगोलिक नामों पर संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों के समूह- यूनाइटेड नेशंस ग्रुप ऑफ एक्सपर्ट्स ऑन ज्योग्राफिकल नेम्स (UNGEGN) समेत कई और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सामने इससे जुड़ी अर्जी डालनी होगी। कोई भी संगठन यह कार्यवाही एकतरफा तौर पर अमेरिका की मांग के चलते नहीं कर सकता।
- इतना ही नहीं नाम बदलने की स्थिति में मैक्सिको की खाड़ी से लगे देशों को अपने मैप्स और कुछ कानूनों में भी बदलाव करना होगा। इसके अलावा इस क्षेत्र से गुजरने वाले अन्य देशों को भी अमेरिका की तरफ से नाम बदलने के प्रस्ताव को मानना होगा। हालांकि, यह उस देश की मर्जी पर निर्भर करेगा कि वह इस क्षेत्र को क्या बुलाना चाहता है।
बाकी संस्थान और देश नहीं माने, क्या फिर भी नाम बदल सकता है अमेरिका?
अमेरिका अपने कानून के तहत किसी भी घरेलू या विदेशी क्षेत्र का नाम बदलने के लिए स्वतंत्र है। भौगोलिक क्षेत्रों के नामों पर फैसले के लिए अमेरिका में एक बोर्ड ऑन ज्योग्राफिक नेम्स (बीजीएन) नाम की सरकारी संस्था भी है, जो कि देश-विदेश में क्षेत्रों के नाम बदल सकती है। हालांकि, उसकी तरफ से बदले गए यह नाम किसी भी तरह की अंतरराष्ट्रीय स्तर की अनिवार्यता पेश नहीं करते। यह सिर्फ अमेरिका के लिहाज से अनिवार्य होते हैं।
अगर ट्रंप बीजीएन के जरिए मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलने के फैसले को मंजूरी दिला भी देते हैं तो यह पहली बार नहीं होगा। अमेरिका के टेक्सास और मैक्सिको के चिहुआहुआ, कोहुइला, नुएवो लियोन और तमाउलिपास राज्यों के बीच सीमा पर बहने वाली नदी को जहां अमेरिका की तरफ से रियो ग्रांडे कहा जाता है, तो वहीं मैक्सिको में इसके लिए रियो ब्रावो नाम चलन में है।
अमेरिका अपने कानून के तहत किसी भी घरेलू या विदेशी क्षेत्र का नाम बदलने के लिए स्वतंत्र है। भौगोलिक क्षेत्रों के नामों पर फैसले के लिए अमेरिका में एक बोर्ड ऑन ज्योग्राफिक नेम्स (बीजीएन) नाम की सरकारी संस्था भी है, जो कि देश-विदेश में क्षेत्रों के नाम बदल सकती है। हालांकि, उसकी तरफ से बदले गए यह नाम किसी भी तरह की अंतरराष्ट्रीय स्तर की अनिवार्यता पेश नहीं करते। यह सिर्फ अमेरिका के लिहाज से अनिवार्य होते हैं।
अगर ट्रंप बीजीएन के जरिए मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलने के फैसले को मंजूरी दिला भी देते हैं तो यह पहली बार नहीं होगा। अमेरिका के टेक्सास और मैक्सिको के चिहुआहुआ, कोहुइला, नुएवो लियोन और तमाउलिपास राज्यों के बीच सीमा पर बहने वाली नदी को जहां अमेरिका की तरफ से रियो ग्रांडे कहा जाता है, तो वहीं मैक्सिको में इसके लिए रियो ब्रावो नाम चलन में है।