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होर्मुज में अमेरिका की बड़ी समुद्री कार्रवाई: 109 जहाजों का रास्ता मोड़ा, मंडराया तेल और व्यापार का महासंकट
Thu, 28 May 2026 01:43 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेहरान
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेहरान
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Thu, 28 May 2026 01:43 AM IST
सार
अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में कार्रवाई करते हुए 109 व्यावसायिक जहाजों का रास्ता बदल दिया है। अमेरिका का कहना है कि यह कदम ईरान पर प्रतिबंध लागू करने के लिए उठाया गया। ईरानी मीडिया ने अमेरिका-ईरान समझौते का दावा किया, लेकिन व्हाइट हाउस ने इसे झूठ बताया। इस तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ रहा है।
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होर्मुज में अमेरिका की कड़ी कार्रवाई
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पश्चिम एशिया में तनाव अब समुद्र तक पहुंच चुका है। अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बड़ी कार्रवाई करते हुए 109 व्यावसायिक जहाजों का रास्ता बदल दिया है। अमेरिकी सेना का दावा है कि यह कदम ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने के लिए उठाया गया। इस कार्रवाई के बाद वैश्विक व्यापार, तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजार में चिंता और बढ़ गई है। दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिका ने जहाजों का रास्ता क्यों बदला?
अमेरिकी सेना ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर यह कार्रवाई की गई। अमेरिका ईरान के बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों पर कड़ी निगरानी रख रहा है। अमेरिकी नौसेना अरब सागर में लगातार हवाई निगरानी और रोकथाम अभियान चला रही है। कई सी हॉक हेलीकॉप्टर समुद्री क्षेत्र में तैनात किए गए हैं ताकि नाकेबंदी को पूरी तरह लागू रखा जा सके। अमेरिका का कहना है कि यह कदम आर्थिक प्रतिबंधों को प्रभावी बनाने के लिए जरूरी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य इतना अहम क्यों माना जाता है?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्गों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है। अप्रैल में शुरू हुई नाकेबंदी के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भारी असर पड़ा है। कई जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई और तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह संकट लंबा चला, तो दुनिया भर में ईंधन और जरूरी सामान महंगे हो सकते हैं।
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ये भी पढ़ें- शादी का खाना बना 'जहर': दावत के बाद 72 लोगों की हालत बिगड़ी, मरीजों का आना जारी, कैबिनेट मंत्री पहुंचे अस्पताल
ईरान और अमेरिका के बीच नया विवाद क्या है?
तनाव उस समय और बढ़ गया जब ईरानी सरकारी मीडिया ने दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच समुद्री व्यापार बहाल करने को लेकर समझौते का मसौदा तैयार हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका खाड़ी क्षेत्र से अपनी सैन्य मौजूदगी कम कर सकता है और नाकेबंदी हटाने पर विचार कर रहा है। बदले में ईरान जहाजों की आवाजाही सामान्य करने का आश्वासन देगा। लेकिन व्हाइट हाउस ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया।
व्हाइट हाउस ने ईरानी दावों पर क्या कहा?
व्हाइट हाउस ने ईरानी मीडिया की रिपोर्ट को “पूरी तरह झूठ” बताया। अमेरिका ने कहा कि किसी भी तरह का समझौता मसौदा तैयार नहीं हुआ है। सोशल मीडिया पर जारी बयान में व्हाइट हाउस ने कहा कि ईरानी सरकारी मीडिया की बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अमेरिका ने कुछ अमेरिकी मीडिया संस्थानों को भी निशाने पर लिया, जिन्होंने इन खबरों को बिना पुष्टि के चलाया था। इससे साफ है कि दोनों देशों के बीच सूचना युद्ध भी तेज हो गया है।
वैश्विक बाजार पर क्या असर पड़ा?
ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते की खबर आते ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हलचल मच गई। अमेरिकी कच्चे तेल की कीमतें 89 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चली गईं क्योंकि निवेशकों को लगा कि तनाव कम हो सकता है। हालांकि बाद में व्हाइट हाउस के इनकार के बाद बाजार में फिर अनिश्चितता बढ़ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज में जारी संकट पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच सकता है मामला?
ईरानी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि अगर 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौता हो जाता है, तो इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के जरिए कानूनी रूप दिया जा सकता है। हालांकि अभी तक किसी भी पक्ष ने आधिकारिक रूप से ऐसे समझौते की पुष्टि नहीं की है। क्षेत्रीय देशों की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम मानी जा रही है।
अब भी दुनिया के सामने कई चुनौती
माना जा रहा है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ा, तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तनातनी ने दुनिया को फिर बड़े भू-राजनीतिक संकट के सामने खड़ा कर दिया है। अब पूरी दुनिया की नजरें होर्मुज और खाड़ी क्षेत्र पर टिकी हुई हैं।
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अमेरिका ने जहाजों का रास्ता क्यों बदला?
अमेरिकी सेना ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर यह कार्रवाई की गई। अमेरिका ईरान के बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों पर कड़ी निगरानी रख रहा है। अमेरिकी नौसेना अरब सागर में लगातार हवाई निगरानी और रोकथाम अभियान चला रही है। कई सी हॉक हेलीकॉप्टर समुद्री क्षेत्र में तैनात किए गए हैं ताकि नाकेबंदी को पूरी तरह लागू रखा जा सके। अमेरिका का कहना है कि यह कदम आर्थिक प्रतिबंधों को प्रभावी बनाने के लिए जरूरी है।
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होर्मुज जलडमरूमध्य इतना अहम क्यों माना जाता है?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्गों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है। अप्रैल में शुरू हुई नाकेबंदी के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भारी असर पड़ा है। कई जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई और तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह संकट लंबा चला, तो दुनिया भर में ईंधन और जरूरी सामान महंगे हो सकते हैं।
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ईरान और अमेरिका के बीच नया विवाद क्या है?
तनाव उस समय और बढ़ गया जब ईरानी सरकारी मीडिया ने दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच समुद्री व्यापार बहाल करने को लेकर समझौते का मसौदा तैयार हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका खाड़ी क्षेत्र से अपनी सैन्य मौजूदगी कम कर सकता है और नाकेबंदी हटाने पर विचार कर रहा है। बदले में ईरान जहाजों की आवाजाही सामान्य करने का आश्वासन देगा। लेकिन व्हाइट हाउस ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया।
व्हाइट हाउस ने ईरानी दावों पर क्या कहा?
व्हाइट हाउस ने ईरानी मीडिया की रिपोर्ट को “पूरी तरह झूठ” बताया। अमेरिका ने कहा कि किसी भी तरह का समझौता मसौदा तैयार नहीं हुआ है। सोशल मीडिया पर जारी बयान में व्हाइट हाउस ने कहा कि ईरानी सरकारी मीडिया की बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अमेरिका ने कुछ अमेरिकी मीडिया संस्थानों को भी निशाने पर लिया, जिन्होंने इन खबरों को बिना पुष्टि के चलाया था। इससे साफ है कि दोनों देशों के बीच सूचना युद्ध भी तेज हो गया है।
वैश्विक बाजार पर क्या असर पड़ा?
ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते की खबर आते ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हलचल मच गई। अमेरिकी कच्चे तेल की कीमतें 89 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चली गईं क्योंकि निवेशकों को लगा कि तनाव कम हो सकता है। हालांकि बाद में व्हाइट हाउस के इनकार के बाद बाजार में फिर अनिश्चितता बढ़ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज में जारी संकट पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच सकता है मामला?
ईरानी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि अगर 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौता हो जाता है, तो इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के जरिए कानूनी रूप दिया जा सकता है। हालांकि अभी तक किसी भी पक्ष ने आधिकारिक रूप से ऐसे समझौते की पुष्टि नहीं की है। क्षेत्रीय देशों की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम मानी जा रही है।
अब भी दुनिया के सामने कई चुनौती
माना जा रहा है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ा, तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तनातनी ने दुनिया को फिर बड़े भू-राजनीतिक संकट के सामने खड़ा कर दिया है। अब पूरी दुनिया की नजरें होर्मुज और खाड़ी क्षेत्र पर टिकी हुई हैं।