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US Election 2020: राष्ट्रपति चुनावों से पहले संयुक्त राष्ट्र के पास क्यों पहुंचने लगी हैं ट्रंप प्रशासन के खिलाफ आवाजें
Sat, 24 Oct 2020 03:52 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Sat, 24 Oct 2020 03:52 PM IST
सार
- ट्रेड यूनियनों से लेकर स्वैड की महिला सदस्यों ने उठाए मानवाधिकार हनन के सवाल
- जोर पकड़ती जा रही है अमेरिकी चुनाव में अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक भेजने की मांग
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डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो : Amar Ujala (फाइल)
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विस्तार
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव से पहले भरोसे का संकट गहराने के संकेत हैं। दो हफ्ते पहले मशहूर दार्शनिक और अश्वेत अधिकार कार्यकर्ता कॉर्नेल वेस्ट ने संयुक्त राष्ट्र से अमेरिकी चुनाव में अपने पर्यवेक्षक भेजने की मांग की थी। अब अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव की स्वैड (दस्ता) नाम से बहुचर्चित चार महिला सदस्यों ने संयुक्त राष्ट्र से अपने देश के होमलैंड सिक्युरिटी डिपार्टमेंट द्वारा आव्रजक महिलाओं के मानवाधिकारों के कथित हनन की जांच की अपील की है।
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इसके पहले अमेरिका की दो बड़ी ट्रेड यूनियनें अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के पास इस बात की शिकायत दर्ज करा चुकी हैं कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के प्रशासन ने कोरोना महामारी के दौर में अंतरराष्ट्रीय श्रम मानदंडों का उल्लंघन किया है।
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अब तक का तजुर्बा यही था कि अमेरिका मानवाधिकार और लोकतंत्र जैसे मुद्दों पर दूसरे देशों को कठघरे में खड़ा करता था। ये मुद्दे उसकी अंतरराष्ट्रीय रणनीति और कूटनीति का अहम हिस्सा थे। मगर ट्रंप के कार्यकाल में तस्वीर पलट रही है। कॉर्नेल वेस्ट ने संयुक्त राष्ट्र को दिए ज्ञापन में कहा था कि अश्वेत समुदाय को मताधिकार से वंचित रखने के उपाय बड़े पैमाने पर अपनाए गए हैं।
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इसके अलावा आशंका है कि चुनाव हारने की स्थिति में राष्ट्रपति ट्रंप अपना पद छोड़ने से इंकार कर देंगे। इसलिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक भेजे जाएं। अब तक ऐसे पर्यवेक्षक उन विकासशील देशों में ही भेजे जाते रहे हैं, जहां लोकतांत्रिक परंपराएं मजबूत नहीं हैं।
पिछले दो वर्षों में अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी सांसद एलेक्जेंड्रिया ओकासियो- कॉर्तेज, रशीदा तलाइब, इलहान उमर और अनाया प्रेसले प्रतिशील राजनीति की मुखर पैरोकार के रूप में चर्चित रही हैं। अब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से गुजारिश की है कि वह आव्रजक महिलाओं के मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन के मामलों की जांच कराए। चारों सांसदों का आरोप है कि बड़ी संख्या में ऐसी महिलाओं को जॉर्जिया स्थित आव्रजन एवं कस्टम प्रवर्तन कार्यालय में हिरासत में रखा गया। वहां उनमें से कुछ का बंध्याकरण कर दिया गया।
अनेक महिलाओं को ऐसी मेडिकल प्रक्रियाओं से गुजारा गया, जिनकी कोई जरूरत नहीं थी। चारों सांसदों ने कहा कि यह डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्युरिटी के हाथों मानवाधिकारों के उल्लंघन के पैटर्न को जाहिर करता है। अमेरिकी सरकार और संस्थाएं इसे रोकने में नाकाम रही हैं। इसलिए अब इन मामलों की पारदर्शी, संपूर्ण और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।
ट्रेड यूनियनों- सर्विसेज इम्पलाइज एसोसिएशन और एएफएल- सीआईओ ने कुछ रोज पहले आईएलओ को भेजे शिकायत पत्र में कहा था कि कई श्रम कानून और उन पर अमल श्रमिक हितों के मुताबिक नहीं रहे हैं। ट्रंप प्रशासन के दौर में ये अमल और कमजोर पड़ा है। शिकायत पत्र भेजे जाने के बाद अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने एक रिपोर्ट में कहा कि ये शिकायत ट्रंप प्रशासन के तहत श्रमिक वर्ग में बढ़ते असंतोष का एक और संकेत है। इससे अमेरिका मजदूरों से गलत व्यवहार करने वाले वैसे देशों की श्रेणी में चला गया है, जो कम विकसित और कम लोकतांत्रिक हैं।
दरअसल, ऐसी तमाम शिकायतें यह संकेत देती हैं कि दुनिया का सबसे महाशक्तिशाली देश अपने भीतर अपनी जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा है। पिछले दिनों ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन में जैसा असंतोष सड़कों पर दिखा, उससे भी इसी बात का सबूत माना गया था। धीरे-धीरे जाहिर यह हो रहा है कि शिकायत किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि असंतोष का दायरा बढ़ता जा रहा है।