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US Dollar: डॉलर के चढ़ते भाव से दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है दुनिया में कर्ज संकट

Fri, 02 Sep 2022 06:39 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 02 Sep 2022 06:39 PM IST
सार

US Dollar: विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व देश में महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरें बढ़ा रहा है, जिस कारण अमेरिका निवेशकों के लिए पसंदीदा बाजार बन गया है। इसका नतीजा डॉलर की कीमत चढ़ने के रूप में सामने आया है...

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US Dollar: debt crisis in world increasing day by day due to the dollar rates hike
US Dollar - फोटो : Pixabay

विस्तार

अमेरिकी मुद्रा डॉलर के भाव में लगातार हो रही बढ़ोतरी से दुनिया भर में कर्ज संकट और गहरा हो रहा है। डॉलर की कीमत इस समय 1985 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर है। डॉलर के भाव चढ़ने का मतलब है कि जिन देशों ने डॉलर में कर्ज लिया था, उनके ऊपर कर्ज का बोझ अपने-आप और बढ़ गया है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व देश में महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरें बढ़ा रहा है, जिस कारण अमेरिका निवेशकों के लिए पसंदीदा बाजार बन गया है। इसका नतीजा डॉलर की कीमत चढ़ने के रूप में सामने आया है। बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटलमेंट्स ने 1994 में विभिन्न मुद्रा के तुलनात्मक भाव को जारी करने की शुरुआत की थी। उसके ताजा आंकड़ों के मुताबिक धनी से लेकर विकासशील देशों तक की मुद्राओं की तुलना में डॉलर इस समय जितना महंगा है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। धनी देशों की मुद्राओं की तुलना में भी डॉलर का भाव 1985 के स्तर से भी ज्यादा हो गया है। जापान की मुद्रा येन की कीमत में गुरुवार को एतिहासिक गिरावट आई। पहली बार जापान के बाजारों में एक डॉलर की कीमत 140 येन हो गई। 1998 के बाद कभी भी येन का भाव इतना कम नहीं हुआ था।

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विशेषज्ञों के मुताबिक डॉलर के महंगा होने का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कई तरह के प्रभाव हो रहे हैं। सबसे खराब असर उन देशों पर पड़ रहा है, जिन्होंने डॉलर में कर्ज ले रखा है। अंतरराष्ट्रीय कर्ज का अध्ययन करने वाली संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस के मुताबिक विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ बीते एक साल में 10 फीसदी बढ़ कर 98.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। इसमें से ज्यादातर बढ़ोतरी डॉलर के महंगा होने की वजह से हुई है।

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विश्व बैंक के मुताबिक 2020 में विकासशील देशों के ऊपर उनके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में कर्ज की मात्रा 207 फीसदी थी। यानी 2010 की तुलना में उन पर सकल की कर्ज की मात्रा 119 फीसदी बढ़ चुकी है। विश्लेषकों के मुताबिक हाल में कर्ज में बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण कोरोना महामारी रही। विभिन्न देशों की सरकारों ने लॉकडाउन के दौरान अपनी जनता को राहत देने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से कर्ज लिया। लेकिन कर्ज उन्हें अधिक ऊंची ब्याज दर पर लेना पड़ा। एक अध्ययन के मुताबिक 2009 की तुलना में 2020 में ब्याज दर 15 फीसदी अधिक थी।

वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक डॉलर जब भी महंगा हुआ है, उससे विकासशील देशों के लिए मुसीबत खड़ी हुई है। वही ट्रेंड इस बार भी देखने को मिल रहा है। इसके परिणामस्वरूप श्रीलंका डिफॉल्टर (कर्ज चुकाने में अक्षम) हो चुका है। कई दूसरे देशों पर भी ये खतरा मंडरा रहा है। इससे बचने की कोशिश में पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आगे नए कर्ज के लिए हाथ फैला चुके हैं।

बीते जून में जारी अपनी एक रिपोर्ट में विश्व बैंक ने कहा था- उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों पर कर्ज ज्यादा है। उनका राजकोषीय और चालू खाते का घाटा भी काफी बढ़ चुका है। इसे देखते हुए उन देशों में वित्तीय संकट खड़ा होने का खतरा है। इस कारण महामारी के असर से उबरना उनके लिए और मुश्किल हो जाएगा।

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