अमेरिका: कोरोना पैकेज से बढ़ेगा घाटा, दूसरे विश्व युद्ध के बाद का सबसे ज्यादा होगा
2021 की समाप्ति तक अमेरिका का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 15 फीसदी तक पहुंच जाएगा। सवाल उठ रहा है कि वह इतना घाटा कब तक झेल पाएगा?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कोरोना महामारी के चलते अमेरिका का भी राजकोषीय घाटा भारी बढ़ सकता है। इस कारण में देश में महंगाई दर में तेज बढ़ोतरी की आशंका पैदा हो गई है।
थिंक टैंक-कमिटी ऑन रेस्पॉन्सिबल फेडरल बजट के एक विश्लेषण के मुताबिक 2021 की समाप्ति तक अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में राजकोषीय घाटा 15 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा घाटा होगा। हाल में पारित 1.9 ट्रिलियन डॉलर के कोरोना राहत पैकेज ने घाटे को काफी बढ़ा दिया है।
जानकारों का कहना है कि इतने बड़े घाटे के कारण महंगाई दर तेजी से बढ़ने की आशंका है। कुछ विश्लेषणों में दावा किया गया है कि ये दर अभी भी उससे कहीं ज्यादा है, जितनी सरकारी आंकड़ों में झलकती है।गौरतलब है कि राष्ट्रपति जो बाइडन ने लगभग सवा दो ट्रिलियन डॉलर का इंफ्रास्ट्रक्चर पैकेज घोषित कर रखा है। जानकारों का कहना है कि अगर इसे कांग्रेस (संसद) ने पारित किया तो घाटा और भी ज्यादा बढ़ जाएगा।
फेड रिजर्व ने छापे डॉलर
पिछले 12 महीनों में कोरोना महामारी के बीच अमेरिकी सरकार ने उदारता से लोगों को राहत पहुंचाई है। इसके लिए फेडरल रिजर्व (अमेरिका के सेंट्रल बैंक) ने डॉलर की अतिरिक्त छपाई की है। बीते 12 महीनों में अमेरिका सरकार ने जितने बांड जारी किए, विदेशी खरीदारों ने उसके आधे की ही खरीदारी की। नतीजा यह हुआ कि बाकी रकम की भरपाई के लिए डॉलर की अतिरिक्त छपाई करनी पड़ी। इसे महंगाई बढ़ाने का नुस्खा बताया जा रहा है।
चीन से आयात सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा
गौरतलब है कि फरवरी 2021 में अमेरिका का व्यापार घाटा एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया। यह एक रिकॉर्ड है। फरवरी तक बीते 12 महीनों में अमेरिका में हुआ चीन से आयात सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया।इसकी वजह यह थी कि अमेरिकी सरकार से लोगों को मिली नकद सहायता से देश में मांग पैदा हुई। लेकिन उसकी सप्लाई के लिए देश के अंदर पर्याप्त उत्पादन नहीं हुआ। इसलिए आयात की भरमार हो गई।
100 साल में ऐसा कभी नहीं हुआ
हांगकांग की वेबसाइट एशिया टाइम्स पर छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि अमेरिका के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी हो गई है, जैसा पिछली एक सदी में कभी नहीं हुआ था। ये विश्लेषण पहले अमेरिका की लॉ एंड लिबर्टी वेबसाइट में प्रकाशित हुआ था। इसके मुताबिक बीते दशकों में दुनिया के सामने अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने का अकेला उपाय डॉलर में निवेश करना था। इसलिए अमेरिकी बांड विदेश खरीदार तुरंत खरीद लेते थे। उससे अमेरिका घाटे में रहते हुए भी बड़े खर्च करने की स्थिति में बना रहता था।
डॉलर की हैसियत कम करना चीन की मंशा
अब चीन एक विकल्प के रूप में खड़ा हो गया है। जानकारों के मुताबिक चीन की समझ यह है कि अमेरिका की राजकोषीय गैर-जिम्मेदारी से विश्व करेंसी के रूप में डॉलर की हैसियत कम होती जाएगी। चीन की फुदान यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बाइ गांग ने कहा है- 'साधारण भाषा में कहें तो हुआ यह है कि अमेरिका ने बीते एक साल में विशाल पैमाने पर अपनी मुद्रा छापी है। इससे कोरोना महामारी के कारण आंशिक या पूर्ण बंदी के दौरान लोगों को जीवित रहने की शक्ति मिली है। ये तरीका प्रभावी रहा। उससे शेयर बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा। लेकिन मैं जोर देना चाहता हूं कि यह भविष्य में डॉलर की क्षमता की कीमत पर हुआ है।'
गांग ने कहा- 'एक देश जिसका दबदबा रहा हो, वह राष्ट्रीय वर्चस्व को खोने के बाद भी लंबे समय तक अपनी मुद्रा का वर्चस्व बनाए रख सकता है। ब्रिटेन का वर्चस्व खत्म होने के बाद भी लगभग 1930 तक पाउंड स्टर्लिंग वैश्विक करेंसी के रूप में काम करता रहा। उस लिहाज से डॉलर अभी किसी दूसरी मुद्रा की तुलना में ज्यादा मजबूत है। लेकिन आंतरिक स्थिति से राहत पाने के लिए मुद्रा को छापना जारी रखा गया, तो अंतरराष्ट्रीय भुगतान सिस्टम की मुख्य मुद्रा के रूप में डॉलर की हैसियत पर जरूर गंभीर असर होगा।' गौरतलब है कि दुनिया पर अमेरिका के वर्चस्व के सबसे प्रमुख कारणों में एक विश्व करेंसी के रूप में डॉलर की मौजूदगी भी है।