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अमेरिका: फेडरल रिजर्व ने बढ़ा दिया है दुनिया भर में स्टैगफ्लेशन का खतरा

Mon, 09 May 2022 03:52 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 09 May 2022 03:52 PM IST
सार

अमेरिका के कई अर्थशास्त्रियों ने फेडरल रिजर्व के ताजा कदम की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि फेडरल रिजर्व ने मुद्रास्फीति रोकने के कदम उठाने में देर की। उसने उस समय ब्याज दर बढ़ाना शुरू किया है, जब महंगाई काफी बढ़ चुकी है। अब सिर्फ मुद्रा की सप्लाई नियंत्रित करने से यह काबू में नहीं आएगी...

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US central bank Federal Reserve increasing interest rates to control the inflation rate, this could lead to the threat of stagflation
फेडरल रिजर्व बैंक - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अमेरिका के सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व ने मुद्रास्फीति दर पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों में इजाफे का रास्ता चुना है। लेकिन इससे स्टैगफ्लेशन का खतरा मंडराने लगा है। स्टैगफ्लेशन उस स्थिति को कहा जाता है, जब मुद्रास्फीति की दर आर्थिक विकास दर से ज्यादा हो जाती है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक वैसी स्थिति में आम तौर पर लोगों के रोजगार और वास्तविक आय के लिए चुनौतियां बढ़ जाती हैं।

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अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि ब्याज दरें महंगी होने का मतलब होगा कि निवेशक कर्ज लेकर नया निवेश करने से बचेंगे। इससे आर्थिक विकास दर गिरेगी। उसका असर रोजगार के माहौल पर पड़ेगा। जिन प्रमुख विशेषज्ञों ने ब्याज दर बढ़ाने की आलोचना की है, उनमें अमेरिका के पूर्व वित्त मंत्री लैरी समर्स और अर्थशास्त्री मोहम्मद अल-एरियन शामिल हैं। समर्स फेडरल रिजर्व के प्रमुख भी रह चुके हैं। ये दोनों अर्थशास्त्री चेतावनी दे चुके हैं कि फेडरल रिजर्व के ताजा रुख से न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया में मंदी की आशंका पैदा हो सकती है।

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अमेरिका में अपना निवेश बढ़ा रहे विदेशी निवेशक

अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने का असर दुनिया भर के शेयर और मुद्रा बाजारों पर महसूस किया जा रहा है। विदेशी निवेशक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों से पैसा निकाल कर अमेरिका में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं। इससे जहां अमेरिकी डॉलर का भाव चढ़ा है, वहीं यूरो, पाउंड, येन, युवान सहित ज्यादातर देशों की मुद्राएं दबाव में आई हैं।

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विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष जेरोम पॉवेल खुद भी इस हफ्ते इसको लेकर आश्वस्त नजर नहीं आए कि ब्याज दर बढ़ाने के उनके कदम से महंगाई काबू में आ जाएगी। इस हफ्ते फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर में आधा फीसदी बढ़ोतरी की। इसका एलान करने के मौके पर पॉवेल ने कहा- ‘मेरी राय में इस बात की अच्छी संभावना है कि इस कदम से कोई गंभीर मंदी नहीं आएगी, जबकि मूल्यों की स्थिरता बहाल होगी। यह कोई नहीं सोचता कि इसका सीधा असर ऐसा ही होगा, लेकिन जो समझ में आता है उसके मुताबिक यही रास्ता है।’

फेडरल रिजर्व की देरी पर सवाल

लेकिन अमेरिका के कई अर्थशास्त्रियों ने फेडरल रिजर्व के ताजा कदम की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि फेडरल रिजर्व ने मुद्रास्फीति रोकने के कदम उठाने में देर की। उसने उस समय ब्याज दर बढ़ाना शुरू किया है, जब महंगाई काफी बढ़ चुकी है। अब सिर्फ मुद्रा की सप्लाई नियंत्रित करने से यह काबू में नहीं आएगी। जबकि ब्याज दर बढ़ने से उन लोगों की मुश्किल बढ़ेगी, जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान खरीदने, कार खरीदने या क्रेडिट कार्ड पर कर्ज ले रखा है। ऐसे लोगों की कर्ज की किश्तें बढ़ने से बाजार उनका उपभोग घटेगा। दूसरी तरफ निवेशकों का उत्साह भी घटेगा। इससे बाजार में मंदी जैसे हालात बनेंगे।  


 

कनाडा के टीवी चैनल सीबीएस की वेबसाइट पर अर्थशास्त्रियों के हवाले से एक टिप्पणी में कहा गया है कि दुनिया स्टैगफ्लेशन के कगार पर है। इसमें कहा गया है- बेशक इस समय आधुनिक काल का इतिहास लिखा जा रहा है। हमें दोनों बुरी चीजों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ महंगाई है, तो दूसरी तरफ स्टैगफ्लेशन।

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