अमेरिका: कोरोना महामारी छोड़ गई है मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्या
विशेषज्ञों का कहना है कि चिंता या डिप्रेशन झेल रहे लोगों को अगर सही ट्रेनिंग दी जाए, तो वे अपनी मानसिक स्थिति से उबरने में सक्षम हो जाएंगे। लेकिन अगर उनकी दिमागी हालत पर ध्यान नहीं दिया गया, तो ये स्थिति और बिगड़ सकती है...
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कोरोना वायरस महामारी ने अमेरिका में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या को और गहरा बना दिया है। विश्लेषकों ने कहा है कि ये समस्या पहले भी गंभीर थी। लेकिन कोरोना महामारी के कारण डेढ़ साल तक जारी रहे तनाव, अलगाव की भावना, और इलाज में पड़ी बाधा ने ऐसे मरीजों की समस्या बढ़ा दी है। महामारी और लॉकडाउन के कारण कई नए लोग भी दिमागी समस्याओं से पीड़ित हो गए हैं।
चिंता और डिप्रेशन की समस्याएं बढ़ीं
वेबसाइट एक्सियोस.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक महामारी के बाद अब मानसिक चिकित्सा की मांग में तेज बढ़ोतरी हुई है। लेकिन देश का हेल्थकेयर सिस्टम इसे उपलब्ध कराने में नाकाम दिख रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक महामारी के दिनों में भी चिंता और डिप्रेशन की समस्याओं में बढ़ोतरी देखने को मिली थी। लेकिन तब बहुत से लोग इलाज के लिए घर से नहीं निकल रहे थे। अब वे इलाज के लिए बाहर आ रहे हैँ, तो उन्हें चिकित्सा सुविधाओं के अभाव का सामना करना पड़ रहा है।
वेबसाइट एक्सियोस ने बताया है कि महामारी की वजह से लोगों में मादक पदार्थों का इस्तेमाल भी बढ़ा है। इसलिए अब बड़ी संख्या में बच्चे और किशोर उम्र के लोग आपातकालीन मानसिक चिकित्सा पाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका के सर्जन जनरल विवेक मूर्ति ने इस वेबसाइट को दिए एक इंटरव्यू में कहा- ‘महामारी ने बहुत से लोगों में नुकसान की एक असाधारण भावना पैदा कर दी है। बहुत से लोगों में इसको लेकर अनिश्चितता गहराई गई थी कि ये मुसीबत कब खत्म होगी। लोगों की जिंदगी में रुकावट पड़ी और बहुत से लोगों की जिंदगी उथल-पुथल का शिकार हो गई।’
‘राष्ट्रीय आपातकाल’ का एलान
बीते महीने बाल चिकित्सा से जुड़े कई संगठनों ने बच्चों की मानसिक सेहत के मामले में ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ का एलान किया था। उधर जो बाइडेन प्रशासन ने स्कूलों के लिए एक परामर्श पत्र जारी किया। इसमें स्कूलों को बताया गया कि बच्चों की व्यवहार संबंधी स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
उधर स्वास्थ्य संबंधी खबर देने वाली एजेंसी काइजर हेल्थ न्यूज ने एक रिपोर्ट में बताया कि अस्पतालों में मनोचिकित्सा की सुविधाओं का अभाव हो गया है। वहां मरीजों की भर्ती के लिए बिस्तरों की भी कमी है। जानकारों का कहना है कि महामारी के बाद हर व्यक्ति इस स्थिति में नहीं है कि वह उसके मानसिक प्रभाव से खुद उबर जाए। विवेक मूर्ति ने कहा- ‘महामारी के कारण कई लोगों के लिए सदमे की स्थिति पैदा हुई। अगर आप उस समय को याद करें, तो समझ सकते हैं कि उसके असर से निकलने में वक्त लगेगा। और सभी लोग खुद ऐसा नहीं कर पाएंगे।’
विशेषज्ञों का कहना है कि चिंता या डिप्रेशन झेल रहे लोगों को अगर सही ट्रेनिंग दी जाए, तो वे अपनी मानसिक स्थिति से उबरने में सक्षम हो जाएंगे। लेकिन अगर उनकी दिमागी हालत पर ध्यान नहीं दिया गया, तो ये स्थिति और बिगड़ सकती है। प्रादेशिक स्वास्थ्य अधिकारियों के संघ के प्रमुख मार्कस प्लेसिया ने कहा- ‘कभी-कभी दिमागी बीमारियों में लोगों को दवा की लत लग जाती है। उन्हें भविष्य में भी लगता है कि ये दवाएं जीवन में सहायक हैं।’ जानकारों के मुताबिक ऐसे लोगों को भी चिकित्सा की जरूरत है।