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स्कॉटलैंड में प्रबल होती आजादी की भावना से चिंतित जॉनसन ने बनाई कैबिनेट कमेटी

Fri, 26 Feb 2021 10:29 PM IST
गौरव पाण्डेय डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, लंदन
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, लंदन Published by: गौरव पाण्डेय Updated Fri, 26 Feb 2021 10:29 PM IST
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UK Prime Minister Boris Johnson formed a cabinet committee because of situation in Scotland
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन - फोटो : twitter.com/BorisJohnson

यूनाइटेड किंगडम की एकता कायम रखने के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपने कैबिनेट की एक कमेटी बनाई है। उनके इस फैसले को इस बात का संकेत माना जा रहा है कि ब्रिटेन में देश की एकता कायम रखने को लेकर चिंताएं लगातार गहराती जा रही हैं। ऐसा खासकर स्कॉटलैंड में आजादी की प्रबल हो रही भावना के कारण हुआ है। ब्रेग्जिट के बाद से स्कॉटलैंड में हुए तमाम जनमत सर्वेक्षणों में देखा गया है कि आजादी का समर्थन करने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है।

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इसके पहले जॉनसन ने अपने कार्यालय में इस मकसद से एक समिति बनाई थी। लेकिन उसके दो प्रमुखों ने समिति के अध्यक्ष पद को छोड़ दिया। पहले ल्यूक ग्राहम ने इस महीने के आरंभ में ये जिम्मेदारी छोड़ी। तब उनकी जगह ऑलिवर लुइस को इस पद पर नियुक्त किया गया। लेकिन उन्होंने कुछ ही हफ्तों में खुद को इस जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया। इस घटनाक्रम को भी ब्रिटेन की एकता के लिए बढ़ रही चुनौतियों का संकेत समझा गया है। इसलिए अब बनाई गई कैबिनेट कमेटी उसे सौंपे गए काम को किस हद तक कर पाएगी, इसको लेकर ब्रिटिश मीडिया में कयास लगाए जा रहे हैं।
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कैबिनेट कमेटी को संघीय रणनीति समिति कहा जाएगा। अगले हफ्ते इसकी पहली बैठक होगी, जिसकी अध्यक्षता खुद प्रधानमंत्री करेंगे। इसमें वित्त मंत्री ऋषि सुनक, कैबिनेट कार्यालय मंत्री माइकल गोव और स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के मामलों के मंत्री भाग लेंगे। बताया जाता है कि इस समिति का गठन ब्रेग्जिट रणनीति कमेटी की तर्ज पर किया गया है। लेकिन इस कमेटी के गठन से स्कॉटलैंड में और गुस्सा भड़क गया है। स्कॉटलैंड की आजादी की समर्थक स्कॉटिश नेशनल पार्टी (एसएनपी) ने समिति के गठन को ‘अति अपमानजनक’ करार दिया है।
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एसएनपी के नेता कर्स्टन ओसवाल्ड ने कहा कि यह शर्मनाक घटनाक्रम कंजर्वेटिव पार्टी की सरकार के अलोकतांत्रिक और स्वतंत्रता विरोधी रुख की स्पष्ट मिसाल है। ओसवाल्ड ने कहा कि सरकार बार-बार चाहे जितनी ब्रांडिंग कर ले, लेकिन उससे ये बात नहीं छिप सकती कि सत्ताधारी पार्टी का आजादी विरोधी अभियान बिखर गया है।

स्कॉटलैंड की प्रांतीय सरकार एसएनपी के हाथ में है। कोरोना वायरस महामारी के दौरान वहां की फर्स्ट मिनिस्टर और एसएनपी की नेता निकोला स्टरजॉन के कामकाज की खूब तारीफ हुई है। जबकि बोरिस जॉनसन के इस दौरान प्रदर्शन से देश में भारी असंतोष है। इन धारणाओं का लाभ आजादी समर्थकों को मिल रहा है। इससे उनकी इस दलील को बल मिला है कि स्कॉटलैंड अपने मामले खुद बेहतर संभाल सकता है।

स्कॉटलैंड में मई में चुनाव होने वाले हैं। चुनाव पूर्व तमाम सर्वेक्षणों में उसमें एसएनपी को बड़ी जीत मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। एसएनपी अपनी उस जीत को आजादी के लिए समर्थन के रूप में पेश करने की तैयारी में है। उसके नेताओं का कहना है कि इस चुनाव में जीत के साथ एसएनपी आजादी के लिए दूसरे जनमत संग्रह कराने की मुहिम छेड़ देगी। स्कॉटलैंड में आजादी के सवाल पर पहला जनमत संग्रह 2014 में हुआ था। लेकिन तब मामूली अंतर से आजादी समर्थक हार गए थे।

लंदन के अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक हालांकि स्कॉटलैंड में आजादी के लिए जन समर्थन बढ़ा है, लेकिन एसएनपी की अंदरूनी लड़ाई इस राह में बाधक साबित हो सकती है। एसएनपी के पूर्व नेता अलेक्स सैलमंड को स्टरजॉन पहले अपना गुरु मानती थीं। 2014 में जनमत संग्रह के बाद सैलमंड ने जब पार्टी का नेतृत्व छोड़ दिया, तो स्टरजॉन नेता बनीं। तब उन्होंने सैलमंड को ‘हमारे आंदोलन का नायक और हमारे राष्ट्र का प्रबल हिमायती बताया था।’ लेकिन अब दोनों के संबंध बिगड़ चुके हैं। सैलमंड ने आरोप लगाया है कि स्टरजॉन ने उन्हें पार्टी से निकालने और जेल में डालने के मकसद से दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाया है।


जनमत सर्वेक्षण विशेषज्ञ जॉन कर्टिस ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा, अभी तक स्कॉटलैंड के लोगों का इन दोनों नेताओं पर भरोसा बना हुआ है। लेकिन इन दोनों के विवाद से एसएनपी के इस दावे की साख घट सकती है कि आजादी के बाद वह संघीय सरकार की तुलना में स्कॉटलैंड को बेहतर शासन देगी। उसका असर अगर दूसरा जनमत संग्रह हुआ, तो उसके नतीजे पर पड़ सकता है। लेकिन फिलहाल लंदन स्थित जॉनसन सरकार स्कॉटलैंड में आजादी के लिए बढ़ रहे जन समर्थन से बेहद चिंतित है।

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