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रेल पर सितम, एयरलाइंस पर करम: यूरोपियन यूनियन का ये कैसा पर्यावरण प्रेम?
Fri, 16 Apr 2021 02:33 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 16 Apr 2021 02:33 PM IST
सार
ट्रांसपोर्ट एंड एनवायरमेंट नाम की संस्था में विमानन प्रबंधक जो दारदेन ने कहा- ‘हमने पिछले साल एयरलाइन प्रदूषण में 64 फीसदी की गिरावट देखी थी। लेकिन अगर एयरलाइन सेक्टर को बेलआउट देना जारी रखा गया, तो उत्सर्जन में ऐसी कमी दीर्घकालिक नहीं होगी...
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यूरोपीय संघ
- फोटो : pixabay
विस्तार
कोरोना वायरस महामारी ने यूरोप में परिवहन उद्योग की कमर तोड़ दी है। पिछले साल उड़ानों की संख्या और रेल सेवा में जो गिरावट आई, वह अब तक नहीं संभल सकी है। यात्रियों की संख्या इस साल भी अब तक सामान्य से बहुत कम बनी हुई है। इस बीच सरकारों ने एयरलाइन कंपनियों की तो खूब मदद की है, लेकिन रेल सेवाओं को वैसी खास सहायता नहीं मिली है। गौरतलब है कि एयरलाइन कंपनियों को 36 अरब यूरो की वित्तीय सहायता मुहैया कराई गई है। आलोचकों का कहना है कि एयरलाइन कंपनियों को मदद बिना शर्त दी गई। उन पर पर्यावण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन की सीमा जैसी कोई शर्त नहीं लगाई गई। इसका मतलब है कि ये सेवाएं पर्यावरण को पहले जैसा ही नुकसान पहुंचाती रहेंगी।
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अब यूरोपियन रेलवे एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के संगठन- सीईआर ने बताया है कि 2020 में रेल कंपनियों को 26 अरब यूरो का नुकसान हुआ। इस साल भी अब तक स्थिति में कोई सुधार नहीं देख गया है। इसकी वजह कोरोना महामारी के कारण प्रतिबंधों का जारी रहना है। एक ऐसी कंपनी यूरोस्टार है, जो दिवालिया होने के कगार पर है। कंपनी ने बीते जनवरी में ही कह दिया था कि वह ‘विनाश’ के रास्ते पर बढ़ रही है। रेल उद्योग काफी समय से सहायता की मांग कर रहा है। लेकिन सरकारों ने इसमें दिलचस्पी नहीं ली है।
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सीईआर के कार्यकारी निदेशक अल्बर्तो माजोला ने टीवी चैनल यूरो न्यूज से कहा- ‘एक तरफ एयरलाइन उद्योग को 35 से 40 अरब यूरो की सहायता दी गई है, वहीं हमें सिर्फ सात अरब यूरो की मदद मिली है। हम इस अंदेशे में डूबे हैं कि हम इस संकट से कैसे निकलेंगे और बाद में इस उद्योग की क्या हालत होगी।’
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सीईआर के मुताबिक यात्रियों की संख्या में 40 से 60 फीसदी तक की गिरावट आई है। इसके बावजूद इस क्षेत्र को पर्याप्त सरकारी मदद नहीं मिली है। इसलिए अब इस उद्योग से जुड़े लोगों ने कहा है कि उन्हें कम से कम उतनी मदद दी जाए, जितनी एयरलाइन उद्योग को दी गई है।
गौरतलब है कि यूरोपीय देश पर्यावरण को खास अहमियत की बात करते हैं। हाल के वर्षों में ग्रीन डील की चर्चा रही है। यूरोपियन यूनियन ने कहा है कि उसका लक्ष्य 2050 जलवायु न्यूट्रल नीति पर अमल करना है। यानी तब तक कार्बन उत्सर्जन को शून्य कर देने का लक्ष्य है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर इस मामले में वे सचमुच गंभीर होते, तो आर्थिक मदद देने के मामले में वे रेल उद्योग को प्राथमिकता देते। रेल परिवहन को सबसे ज्यादा पर्यावरण सम्मत परिवहन माना जाता है। जबकि विमान सेवाएं पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं। इसके बावजूद पिछले हफ्ते यूरोपीय आयोग ने एयर फ्रांस को चार अरब यूरो की सहायता देने के फ्रांस सरकार के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी।
ट्रांसपोर्ट एंड एनवायरमेंट नाम की संस्था में विमानन प्रबंधक जो दारदेन ने यूरो न्यूज से कहा- ‘हमने पिछले साल एयरलाइन प्रदूषण में 64 फीसदी की गिरावट देखी थी। लेकिन अगर एयरलाइन सेक्टर को बेलआउट देना जारी रखा गया, तो उत्सर्जन में ऐसी कमी दीर्घकालिक नहीं होगी। बिना पर्यावरण संबंधी कड़ी शर्तें लगाए इस सेक्टर को धन देना जारी रखा जा रहा है।’ उन्होंने कहा- ‘एयरलाइन उद्योग को अरबों यूरो की सहायता क्यों मिलनी चाहिए? और ऐसी सहायता रेलवे को क्यों नहीं मिलनी चाहिए? सिर्फ कुछ क्षेत्रों को सरकार से मदद मिलने का कोई राजनीतिक या सामाजिक तर्क नहीं है। खासकर उन क्षेत्रों को, जिनका कोरोना महामारी के पहले प्रदूषण फैलाने में सबसे बड़ा योगदान था।’
ईयू के ग्रीन डील का पूरा ब्योरा अगले जून में जारी होगा। लेकिन इस मामले में यूरोपीय देशों की गंभीरता पर पहले से सवाल उठ रहे हैं। ये सवाल उनकी घोषणाओं के विपरीत उनके व्यवहार के कारण उठे हैं।