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अफगानिस्तान में प्रांतीय परिषद के सदस्य समेत तीन की हत्या, तालिबानी शासन के फिर से लौटने का डर

Mon, 09 Mar 2020 03:03 AM IST
संजीव कुमार झा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल Published by: संजीव कुमार झा Updated Mon, 09 Mar 2020 03:03 AM IST
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Three killed including a member of the provincial council in Afghanistan
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

तालिबान और अमेरिका के बीच हुए शांति समझौते के बाद भी अफगानिस्तान में हमले रुक नहीं रहे। राजधानी काबुल में रविवार को कुछ अज्ञात हमलावरों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर तीन लोगों की हत्या कर दी। मृतकों की पहचान पूर्वी लोगार प्रांत के प्रांतीय परिषद के सदस्य नसीर घेरात और उनके दो अंगरक्षकों के रूप में हुई है।

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काबुल पुलिस के प्रवक्ता फिरदौस फरमराज ने नसीर घेरात और उनके अंगरक्षकों की हत्या की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि अब तक किसी संगठन ने इन हत्याओं की जिम्मेदारी नहीं ली है। 29 फरवरी को अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते के बाद आतंकी हमलों की कई घटनाएं हो चुकी हैं। शुक्रवार को दिवंगत शिया नेता अब्दुल अली माजरी की बरसी पर आयोजित शोकसभा के दौरान हुए आतंकी हमले में 32 लोगों की मौत हो गई थी।
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इस हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने ली थी। राष्ट्रपति भवन के प्रवक्ता सादिक सिद्दीकी ने रविवार को ट्वीट कर बताया कि राष्ट्रपति अशरफ गनी ने शोकसभा में हुए आतंकी हमले की जांच के लिए एक समिति गठित की है। टैक्सी ड्राइवर नूर अहमद (37) ने बताया कि राजधानी काबुल में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। आतंकी जो चाहते हैं करते हैं, जो बहुत डरावना है।

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तालिबान के फिर से लौटने का सता रहा डर

अफगानिस्तान में महिलाओं की आवाज रहीं रोया सादत को तालिबान का शासन फिर से लौटने का डर सता रहा है। देश की पहली महिला फिल्म निर्माता 37 साल की सादत ने कहा, ‘मुझे चिंता होती है जब याद आता है कि 9/11 होने से पहले तक कैसे हम तालिबान के पांच साल के शासन को भूल गए थे।

अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय हमें फिर से छोड़ देता है तो निस्संदेह इसके गंभीर नतीजे होंगे। 2001 में तालिबान के कमजोर पड़ने के बाद सादत ने ऐसे दौर में जिंदगी जी जब उनके परिवार को जान बचाकर भागना पड़ा, गृह युद्ध की वीभत्सता को झेलना पड़ा।

फिर तालिबान के दमनकारी शासन को बर्दाश्त किया, जहां महिलाओं को खौफ के साए में रहना पड़ा और उनकी मूल आजादी तक छीन ली गई। अब सादत का सबसे बड़ा डर तालिबान के उसी शासन के फिर से लौट आने का है। दूसरी ओर, अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन ने तालिबान के साथ शांति वार्ता में महिलाओं को भी शामिल किए जाने की मांग की है।
 

पाक, अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार

हजारा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता डीक्यू अली ने आरोप लगाया कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान में लोगों को धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किया जा रहा है। मूल रूप से मध्य अफगानिस्तान के रहने वाले अली ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने का आग्रह किया।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 43वें सत्र में हिस्सा लेने के बाद अली ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हजारा समुदाय पर तालिबान, आईएस और दूसरे कट्टरपंथी सुन्नी संगठनों के बढ़ते हमलों पर चिंता जताई।

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