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Israel Iran Crisis: इस्राइल-ईरान के बीच छिड़ी जंग में अभी कई पेंच हैं...; असली सवाल बढ़ते अमेरिकी दबदबे का?

Wed, 18 Jun 2025 03:11 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Wed, 18 Jun 2025 03:11 PM IST
सार

सामरिक और रणनीतिक मामले के जानकार कहते हैं कि ईरान इतनी आसानी से समर्पण नहीं करेगा। मध्यस्थता के वार्ताकार देश सफल नहीं हो पाए हैं। उम्मीद है कि अभी यह लड़ाई चल सकती है। ईरान के घुटने टेकने का मतलब हुआ कि मध्य-पूर्व में अमेरिका, इस्राइल का पूरा दखल बढ़ जाएगा। यह चीन और रूस दोनों को अखर रहा है।  

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There are still many twists in the war between Israel and Iran real question is growing American dominance?
इस्राइल-ईरान संघर्ष - फोटो : PTI

विस्तार

ईरान और इस्राइल की जंग खुलकर हो रही है। मध्य-पूर्व भड़की आग ने न केवल दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है, बल्कि अब यह लड़ाई पेंचीदा होती जा रही है। चीन ने इस लड़ाई के लिए सीधे अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन खामोश हैं। जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जी-7 शिखर सम्मेलन छोड़कर वाशिंगटन लौट आए हैं। ईरान को संघर्ष विराम नहीं, अब सीधे समर्पण करने का प्रस्ताव दे रहे हैं। आखिर क्या होने वाला है?

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सामरिक और रणनीतिक मामले के जानकार कहते हैं कि ईरान इतनी आसानी से समर्पण नहीं करेगा। मध्यस्थता के वार्ताकार देश सफल नहीं हो पाए हैं। उम्मीद है कि अभी यह लड़ाई चल सकती है। ईरान के घुटने टेकने का मतलब हुआ कि मध्य-पूर्व में अमेरिका, इस्राइल का पूरा दखल बढ़ जाएगा। यह चीन और रूस दोनों को अखर रहा है।  
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ईरान ने इस्राइल की नाक पकड़ ली है
अमेरिका की तमाम घड़ुकयों, धमकियों से बेपरवाह ईरान से सीधे अपने अस्तित्व के लिए दुश्मन बने इस्राइल की सीधे नाक पकड़ ली है। उसकी और अमेरिका की असल की चिंता ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम की संभावना है। भारतीय सामरिक और रणनीतिक  विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के हमले में इस्राइल को बड़ा नुकसान हुआ है। इस्राइल में मीडिया से लेकर सूचना पर जबरदस्त पाबंदी है। इसलिए नुकसान, हमले की घातकता और अन्य खबरें पूरी तरह से बाहर नहीं आ रहा है। ईरान के पास कई तरह की और बड़ी संख्या में मिसाइल (प्रोजेक्टाइल) हैं। तेल अवीव में रह चुके सूत्र की माने की तो ईरान ने घातक रेंज की मिसाइलों को दागना शुरू किया है और अभी उसके पास इससे भी उन्नत मिसाइलें हो सकती हैं। सूत्र का कहना है कि इस्राइल के नागरिक भी सुरक्षित ठिकाने की तलाश में निकल रहे हैं। इसलिए अभी आगे लड़ाई जारी रहने की संभावना है।
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क्या इस्राइल ने ईरान की रीढ़ तोड़ दी?
सामरिक और रणनीतिक मामलों के जानकार सूत्र का कहना है कि ईरान के फोर्डे परमाणु संयंत्र पर इस्राइल ने हमले की बड़ी कोशिश की है, लेकिन सफलता नहीं मिली। सूत्र का कहना है कि इस्राइल के हमले में ईरान के सेना प्रमुख, उप प्रमुख, टॉप आपरेशन कमांडर, वैज्ञानिक और अन्य महत्वपूर्ण लोग मारे गए हैं। ईरान का खुफिया मुख्यालय समेत तमाम सामरिक महत्व की इमारतें ध्वस्त हुई हैं। उसकी वायु रक्षा प्रणालियों को बड़ा नुकसान पहुंचा है, लेकिन ईरान के रणनीतिकारों को इस्राइल से इस तरह की प्रतिक्रिया का पहले से अंदाजा था। इसलिए उन्होंने तमाम वैकल्पिक तैयारियां कर रखी हैं।  पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि तीव्र गति मिसाइल भी ईरान ने दागी हैं।

पहले समझिए... कौन है ईरान?
मध्य पूर्व में अमेरिका और इस्राइल से खांटी दुश्मनी रखने वाला देश इस समय ईरान है। ईरान में चीन के ऊर्जा सुरक्षा से लेकर अन्य हित जुड़े हैं। बड़े पैमाने पर चीन ने वहां निवेश किया है। ईरान की प्रगाढ़ मधुरता रूस से हैं। रूस ईरान के हितों का ध्यान रख रहा है। ईरान, सीरिया जैसे देश मध्य-पूर्व में रूस से अच्छा समीकरण बनाने वालों में थे। सीरिया में सत्ता पलट हो चुका है। वहां से राष्ट्रपति बसर अल असद के सत्ता छोड़कर भागने और रूस में शरण लेने के बाद सीरिया पर अमेरिकी हित को समझने वाली सरकार का राज है। अब इस श्रेणी में ईरान ही बचा है। ईरान ने मध्य-पूर्व में अपना काफी दखल बना रखा था। सीरिया, लेबनान, यमन, फिलिस्तीन में ईरान की पैठ थी। हिज्बुल्ला, हमास, हूती जैसे संगठनों को ईरान से ताकत मिलती थी और अमेरिका के साथ -साथ यह सब इस्राइल को आंख दिखाते थे। माना जा रहा है कि ईरान में वहां के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खामेनेई की सत्ता जाते ही, सब कुछ बदल जाएगा। रूस के मध्य-पूर्व में  दखल को करारा झटका लगेगा। इसके समानांतर पूरे मध्य-पूर्व में अमेरिकी हित, प्रभाव और सर्वोच्चता स्थापित हो जाएगी। आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ के रूप में इसका चीन को बड़ा नुकसान होगा।

क्या है इस्राइल?
इस्राइल अपने अस्तित्व के लिए ईरान को सबसे बड़ा खतरा मानता है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम इस्राइल को हमेशा अज्ञात भय डराते रहते हैं। इस्राइल का हमेशा से मानना है कि उसके विद्रोहियों (हमास, हिज्बुल्ला, हूती) को ईरान के जरिए हथियार मिलते हैं। शिया बाहुल ईरान सीरिया, इराक समेत अन्य देशों के सहारे इस्राइल और अमेरिका के लिए परेशानी खड़ी करता रहता है। दूसरे इस्राइल के पास सबसे बड़ा भरोसा अमेरिका का है। इस्राइल और अमेरिका दोनों परमाणु हथियार विहीन ईरान चाहते हैं। इस्राइल ने मध्य-पूर्व एशिया में बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती कर रखी है। यूएसएस निमित्ज को भी संभावित खतरों के बाबत ही अमेरिका ने दक्षिण चीन सागर से भूमध्य सागर की तरफ रवाना किया है। यूएसएस निमित्ज अपने आपमें चलता फिरता युद्ध का शस्त्रागार है। इस युद्धपोत पर निगरानी, हवाई सुरक्षा से लेकर तमाम अत्याधुनिक प्रणा ली तैनात है। एफ-18 सुपर हार्नेट, एफ-35 लाइटेनिंग जैसे घातक फाइटरजेटों, ड्रोन आदि की फ्लीट है और यह पलक झपकते किसी भी देश पर आफत बन सकते हैं।

सही टाइमिंग और ट्रंप के ग्रेट अमेरिका का का एजेडा है ईरान का समर्पण
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि ईरान को अब समर्पण करना होगा। वह जी-7 शिखर सम्मेलन में इस्राइल के युद्ध जीतने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। जी-7 में जाने से पहले उन्होंने रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से बात की थी। इस बातचीत में पुतिन की मध्य-पूर्व की चिंता शामिल थी। ट्रंप और इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतेन्याहू को पता है कि रूस इस समय यूक्रेन में फंसा है। वह ईरान की मदद करने की स्थिति में नहीं है। रूस ने इसी के कारण सीरिया की मदद नहीं की थी और अमेरिका के ईशारे पर इस्राइल ने सीरिया में धावा बोलकर राष्ट्रपति बसर अल असद की सत्ता को उखाड़ फेंका था। ईरान के मंत्री कहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप के एक फोन कॉल से इस्राइल-ईरान जंग रुक जाएगी। ईरान के मंत्री का यह बयान अनायास नहीं है। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार मानते हैं कि यूक्रेन को नाटो का सपना दिखाकर अमेरिका ने बड़े तरीके से रूस को उलझाया। अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान-इस्राइल जंग में यह टाइमिंग सही लग रही है। वह ईरान में सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खामेनेई को सत्ता से बेदखलकर ‘द ग्रेट अमेरिका’के अपने सपने को साकार कर सकते हैं। इसलिए ट्रंप अब ईरान को परमाणु ताकत न बनने देने का हवाला देकर दोनों देशों में संघर्ष विराम की बजाय ईरान के समर्पण करने की बात कर रहे हैं।  


क्या साकार हो पाएगा इस्राइल और ईरान का सपना या फिर फंसेगा पेंच
चीन चाहता है कि संघर्ष विराम हो जाए। रूस की भी मंशा यही है। तुर्किए, जार्डन, मिस्र समेत तमाम देश जंग के पक्ष में नहीं है। 21 इस्लामिक देशों ने भी ईरान के समर्थन में संघर्ष विराम की मांग की है। इन सबके बीच में ईरान और इस्राइल अपने अग्नेयास्त्र दाग रहे हैं। रंजीत कुमार कहते हैं कि रूस और चीन के ईरान के समर्थन में आने के बाद अमेरिका और इस्राइल की दादागिरी रुक सकती है। लेकिन देखना है कि आगे क्या होता है? यह ठीक वही स्थिति है, जैसे 2015 में सीरिया में प्रयास हुए थे और रूस के मैदान में कूदने के बाद 9 साल के लिए सब टल गया था।

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