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कैपिटल हिल हमले की दोबारा जांच: अमेरिकी लोकतंत्र का क्या होगा, ये चिंता सता रही है विशेषज्ञों को
Wed, 07 Jul 2021 03:44 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Wed, 07 Jul 2021 03:44 PM IST
सार
विधि विशेषज्ञों के मुताबिक अब ऐसा कई कानूनी रास्ता नहीं बचा है, जिससे नवंबर 2020 के चुनाव नतीजे क पलटा जा सके। लेकिन हालिया जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक अमेरिका में लगभग एक तिहाई रिपब्लिकन पार्टी समर्थक मतदाता मानते हैं कि नवंबर 2020 के चुनाव नतीजे को पलट दिया जाएगा और ट्रंप फिर से राष्ट्रपति बन जाएंगे...
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कैपिटल हिल में हुई हिंसा
- फोटो : PTI (फाइल फोटो)
विस्तार
अमेरिकी कांग्रेस (संसद) बीते छह जनवरी को कैपिटल हिल (संसद भवन) पर हुए हमले नए सिरे से जांच शुरू कर रही है। इस बीच अमेरिकी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक जो सियासी सोच उस हमले के लिए जिम्मेदार थी, अमेरिका में उसकी सक्रियता में कोई कमी नहीं आई है। इससे जुड़े समूह अब भी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस आरोप को प्रचारित कर रहे हैं कि नवंबर 2020 में ट्रंप को धांधलियों के जरिए चुनाव हराया गया।
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विधि विशेषज्ञों के मुताबिक अब ऐसा कई कानूनी रास्ता नहीं बचा है, जिससे नवंबर 2020 के चुनाव नतीजे क पलटा जा सके। लेकिन हालिया जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक अमेरिका में लगभग एक तिहाई रिपब्लिकन पार्टी समर्थक मतदाता मानते हैं कि नवंबर 2020 के चुनाव नतीजे को पलट दिया जाएगा और ट्रंप फिर से राष्ट्रपति बन जाएंगे।
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इन हालत से लोकतंत्र के अध्ययनकर्ता चिंतित हैं। अमेरिकी टीवी चैनल एनबीसी ने आधा दर्जन ऐसे अध्ययनकर्ताओं से बातचीत कर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसके मुताबिक ये विशेषज्ञ इस आशंका को लेकर चिंतित हैं कि 2024 के चुनाव में 2020 जैसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं। उनके मुताबिक उस समय तक असंतुष्ट गुट और संगठित हो जाएंगे और मनपसंद चुनाव नतीजा ना आने पर उसे पलटने की जोरदार मुहिम चलाएंगे।
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आहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में कानून के प्रोफेसर एडवर्ड बी फॉली ने एनबीसी से कहा- ‘बेशक छह जनवरी को हुआ विद्रोह अपने हिंसक रूप और लोकतंत्र पर हमले के कारण भयानक था। लेकिन उससे चुनाव परिणामों को पलटा नहीं जा सका। जबकि अभी चिंता यह है कि कहीं वह घटना कहीं आगे का रिहर्सल (पूर्वाभ्यास) साबित ना हो।’
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में कानून के प्रोफेसर रिक हेसेन ने कहा- ‘हमें यह सोच कर सच से आंखें नहीं चुरानी चाहिए कि जो हुआ वह कुछ उन्मादी लोगों का काम था या जो आशंकाएं जताई जा रही हैं, वे महज काल्पनिक हैं। हमने 2020 में ट्रंप को जो करते देखा, उससे साफ है कि अब ऐसा होना संभावनाओं के दायरे में आ गया है। ऐसा ना हो इसके लिए कानून बनाने की जरूरत है, ताकि हम निष्पक्ष चुनाव को सुनिश्चित कर पाएं।’
इस बीच अमेरिका के रिपब्लिकन पार्टी शासन वाले राज्यों में मतदान अधिकार को संकुचित करने के लिए बनाए गए कानूनों ने नई चिंता पैदा कर दी है। एरिजोना राज्य के ऐसे नए कानून को पिछले हफ्ते अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दे दी। इससे चिंता और बढ़ गई है। थिंक टैंक- न्यू अमेरिका फाउंडेशन में सीनियर फेलो ली ड्रुटमैन के मुताबिक रिपब्लिकन पार्टी अपने समर्थकों के दबाव में है। पिछले महीने न्यू अमेरिका फाउंडेशन ने एक सर्वे रिपोर्ट जारी की थी, जिससे सामने आया कि 46 फीसदी रिपब्लिकन समर्थक ऐसे कानून के पक्षधर हैं, जिससे राज्यों की विधायिका को नवंबर 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे को पलटने का अधिकार मिल जाए।
ट्रुटमैन ने कहा- ‘रिपब्लिकन समर्थकों में भावना यह है कि हम वैध अमेरिकी हैं और हमारा नैसर्गिक बहुमत है। इस बीच दूसरा पक्ष तभी जीत सकता है, अगर वह धोखाधड़ी करे।’ जाहिर है, आबादी के इतने बड़े हिस्से में ऐसी सोच का होना लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।