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ओली के मनमाने फैसलों से एक बार फिर छिड़ा विवाद, तीन अहम पदों पर अपने चहेतों को बैठाया
Fri, 02 Oct 2020 08:23 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 02 Oct 2020 08:23 PM IST
सार
- रेगमी को ब्रिटेन का तो खाटीवाडा को अमेरिका का राजदूत बनाया, बैरागी बनाए गए मुख्य सचिव
- पार्टी से नहीं ली नियुक्तियों पर कोई सलाह, नेता नाराज़, विपक्ष ने लगाया घूसखोरी का आरोप
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Prachand and kp sharma oli
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली पर उनकी पार्टी ने एकबार फिर मनमाने फैसले लेने का आरोप लगाया है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के कई नेताओं ने कहा है कि ओली ने जिस तरह मनमाने तरीके से मुख्य सचिव और दो राजदूतों की नियुक्ति की वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है। ओली ने मुख्य सचिव के तौर पर काम कर रहे लोक दर्शन रेगमी से इस्तीफा दिलवा कर उन्हें ब्रिटेन का राजदूत बना दिया जबकि रेगमी दो हफ्ते बाद रिटायर होने वाले थे। उनकी जगह विदेश सचिव रहे शंकर दास बैरागी को मुख्य सचिव बना दिया गया।
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उसी तरह युबराज खाठीवाडा को वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा दिलवाकर अमेरिका का राजदूत बना दिया गया है। ये फैसले ओली ने खुद लिए और कैबिनेट से मंजूरी दिलवा दी जबकि पार्टी ने ऐसे फैसलों के बारे में विचार विमर्श तरने के लिए बाकायदा एक समिति बना रखी है। लेकिन ओली ने ऐसा नहीं किया। नेपाल के एक पूर्व प्रशासनिक अफसर ने कहा कि देश में अब भी पारंपरिक तरीके से ही मनमाने फैसले लिए जा रहे हैं और कहने को नेपाल अब लोकतांत्रिक देश रह गया है।
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पूर्व मुख्य सचिव बिमल कोइराला तो सीधे तौर पर सरकार पर घूसखोरी का आरोप लगाते हैं और कहते हैं कि ओली सरकार बड़े प्रशासनिक अफसरों से रिश्वत लेकर ऐसे फैसले ले रही है। उनका कहना है कि रिटायरमेंट से दो हफ्ते पहले रेगमी को ऐसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिया जाने से साफ है कि पहले से ये मामला तय था। उसी तरह खाटीवाडा के मामले में भी ये कहा जा रहा है कि वो ओली के सबसे खास लोगों में रहे हैं इसलिए बिना सोचे समझे उन्हें अमेरिका का राजदूत बना दिया गया।
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कोइराला कहते हैं कि वक्त से पहले रिटायरमेंट लेने की परंपरा अच्छी नहीं है और ऐसी कई मिसालें हैं कि रिटायरमेंट के ऐसे प्रस्ताव पहले से कुछ डील हो जाने के बाद ही सामने आते हैं। इससे नौकरशाही व्यवस्था कमजोर होती है और ज्यादातर ब्यूरोक्रेट्स इसी जोड़तोड़ में लगे रहते हैं कि कैसे उन्हें कोई मलाईदार पद मिल जाए। फरवरी 2018 में ओली के पद संभालते ही कई प्रशासनिक अफसरों ने ये उम्मीद जता दी थी कि ओली किसी भी तरह अपनी पसंद का मुख्य सचिव रखेंगे। वैसे भी हर प्रधानमंत्री ऐसा ही करता है जबकि कम्युनिस्ट पार्टियों में ऐसी व्यवस्था नहीं रही है और बगैर पार्टी की मुहर के सरकारी नियुक्तियां नहीं होती हैं, इसलिए ओली के कामकाज के तरीकों पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं और खासकर प्रचंड गुट ने तो शुरू से ही उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा था।
अब जबकि पार्टी ने दोनों के विवाद को सुलझाने के लिए प्रचंड को पार्टी की सारी जिम्मेदारी बतौर अध्यक्ष सौंप दी है, तो उन्हें और उनके समर्थकों को ओली के हर फैसले फिर से खटकने लगे हैं। सीपीएन के कई महत्वपूर्ण नेता ओली के इन फैसलों फिलहाल खुलकर नहीं बोल रहे लेकिन माधव नेपाल के खास माने जाने वाले पार्टी की स्थाई समिति के सदस्य बेदूराम भुसाल और वरिष्ठ नेता झालानाथ खनाल बताते हैं कि ओली ने ये फैसला खुद किया है और पार्टी से इस बारे में राय नहीं ली गई है।