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तालिबान: अफगानिस्तान में युद्ध का निर्विवाद विजेता है अब्दुल गनी बरादर, ब्रिटिश रिपोर्ट में दावा

Mon, 16 Aug 2021 08:26 PM IST
गौरव पाण्डेय वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Mon, 16 Aug 2021 08:26 PM IST
सार

अमेरिका के अनुरोध पर तीन साल पहले पाकिस्तान की जेल से रिहा होना वाला तालिबानी नेता अब्दुल गनी बरादर अफगानिस्तान में 20 साल से चल रहे युद्ध का निर्विवाद विजेता के तौर पर उभरा है। यह दावा ब्रिटेन की एक मीडिया रिपोर्ट में किया गया है। तालिबान का प्रमुख नेता हैबतुल्ला अखुंदजादा है और बरादर इसका राजनीतिक प्रमुख और इसका सबसे ज्यादा सार्वजनिक चेहरा है। 

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Taliban leader Ghani Baradar is undisputed victor of war in Afghanistan says a British report news in Hindi
अब्दुल गनी बरादर (बीच में) - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

दि गार्जियन ने रविवार को एक रिपोर्ट में लिखा, काबुल के पतन को लेकर टेलीविजन पर जारी एक बयान में उसने (बरादर ने) कहा कि तालिबान की असली परीक्षा केवल शुरू हुई है और हमें देश की सेवा करनी है। रिपोर्ट के अनुसार अब्दुल गनी बरादर की अफगानिस्तान की सत्ता में वापसी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अफगानिस्तान अपने खूनी अतीत से बचने में पूरी तरह असमर्थ रहा है।

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बरादर का जन्म साल 1968 में उरुजगन प्रांत में हुआ था। 1980 के दशक में वह अफगान मुजाहिदीन की सोवियत के खिलाफ लड़ाई में शामिल हुआ था। साल 1992 में रूस को देश से बाहर करने के बाद अफगानिस्तान में गृह युद्ध की स्थिति बन गई थी। इस दौरान अब्दुल गनी बरादर ने पूर्व कमांडर और अपने बहनोई, मोहम्मद उमर के साथ मिलकर कंधार में एक मदरसे की स्थापना की थी।
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इन दोनों ने मिलकर तालिबान की स्थापना की थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान की स्थापना देश के 'धार्मिक शुद्धिकरण' और एक 'अमीरात' के निर्माण के लिए समर्पित युवा इस्लामी विद्वानों के नेतृत्व में शुरू हुआ एक आंदोलन था। हालांकि, बीते कुछ महीनों में अफगानिस्तान में सामान्य नागरिकों, नेताओं, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं की हत्याएं तालिबान की अलग ही छवि बनाती हैं।
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धार्मिक उत्साह, प्रशासन के प्रति नफरत और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस) के सहयोग के साथ साल 1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान की कई प्रांतीय राजधानियों पर कब्जा करने के साथ पूरी दुनिया को आश्चर्य में डाल दिया था। दि गार्जियन की रिपोर्ट में कहा गया है कि तब भी वैसी ही स्थिति बनी थी जैसी हाल के कुछ सप्ताहों में यहां देखने को मिली है। 

उल्लेखनीय है कि बरादर को रणनीति बनाने में बहुत माहिर माना जाता है और साल 1996 में तालिबान की जीत में उसने अहम भूमिका निभाई थी। पांच साल के तालिबान शासन के दौरान अब्दुल गनी बरादर ने सैन्य और प्रशासनिक भूमिकाएं निभाई थीं। इसके साथ ही जब अमेरिका और उसके अफगान सहयोगियों ने तालिबान को सत्ता से हटा दिया, तब तक वह उप रक्षा मंत्री के पद पर था।

20 साल तक सत्ता से बाहर रहने के दौरान बरादर को एक सैन्य नेता और राजनीतिक संचालक के रूप में देखा गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका में बराक ओबामा का प्रशासन बरादरी के उदारवादी झुकाव को लेकर आशान्वित कम और उसकी सैन्य विशेषज्ञता से डर अधिक था। सीआईए ने 2010 में उसके कराची में होने का पता लगाया था और उसी साल फरवरी में उसे गिरफ्तार किया गया था।

बरादर की गिरफ्तारी युद्ध में उसकी भूमिका के चलते थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि तथ्य यह है कि पाकिस्तान उसे इतने वर्षों तक पकड़े रहा क्योंकि अमेरिका ने उसे ऐसा करने के लिए कहा था। लेकिन, 2018 में ट्रंप की सरकार आने पर अमेरिका का रुछ बदला और ट्रंप के अफगानी राजदूत जलमय खलीलजाद ने पाकिस्तान से बरादर को रिहा कर देने के लिए कहा, जिससे वह कतर में वार्ता कर सके। 


पाकिस्तान ने बरादर को अक्तूबर 2018 में जेल से रिहा किया था। इसके बाद बरादर ने फरवरी 2020 में अमेरिका के साथ दोहा समझौते पर दस्तखत किए थे। इसे ट्रंप प्रशासन ने शांति की ओर बड़ा कदम करार दिया था। इस शांति समझौते के तहत अमेरिका को अपनी सेनाएं अफगानिस्तान से वापस लेनी थीं और तालिबान को अमेरिकी सुरक्षा बलों पर किए जा रहे हमलों पर लगाम लगानी थी।

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