अफगानिस्तान: तालिबान से क्या चाहता है रूस, इसे लेकर जारी हैं कयास
रूस ने अभी तक तालिबान को आतंकवादी संगठनों की सूची से नहीं हटाया है। इस बारे में रूसी विश्लेषकों का कहना है कि रूस ने तालिबान को ‘प्रोबेशन’ पर रखा है। रूस यह देखना चाहता है कि क्या तालिबान सचमुच नशीली दवाओं के कारोबारियों और अधिक चरमपंथी मजहबी गुटों के खिलाफ कदम उठाने के लिए सचमुच तैयार है...
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तालिबान के प्रति रूस के रुख को लेकर कयास तेज हो गए हैं। हफ्ते भर पहले रूस ने तालिबान के प्रतिनिधिमंडल को मास्को आमंत्रित किया था। वहां भारत, चीन, ईरान, पाकिस्तान और मध्य एशियाई देशों के प्रतिनिधि भी बुलाए गए। इस बातचीत से किसी ऐसे समझौते की शक्ल नहीं उभरी, जिसे बड़ी कामयाबी समझा जाए। इसके बावजूद तालिबान ने मास्को वार्ता को अपनी एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में लिया है।
चीन और पाकिस्तान को बताया सहयोगी
मास्को पहुंचे तालिबान के अधिकारियों ने रूसी समाचार एजेंसी आरआईए नोवोस्ती से बातचीत में चीन और पाकिस्तान को अपना सहयोगी बताया। साथ ही रूस को उन्होंने अपना संभावित सहयोगी कहा। तालिबान के प्रवक्ता जबिहुल्लाह मुजाहिद ने रूस से आग्रह किया कि वह तालिबान और संयुक्त राष्ट्र के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाए। उन्होंने अफगानिस्तान में नई आर्थिक परियोजनाएं शुरू करने के लिए रूसी कंपनियों को न्योता भी दिया।
लेकिन रूस ने अभी तक तालिबान को आतंकवादी संगठनों की सूची से नहीं हटाया है। इस बारे में रूसी विश्लेषकों का कहना है कि रूस ने तालिबान को ‘प्रोबेशन’ (जांच-परख के दौर) पर रखा है। रूस यह देखना चाहता है कि क्या तालिबान सचमुच नशीली दवाओं के कारोबारियों और अधिक चरमपंथी मजहबी गुटों के खिलाफ कदम उठाने के लिए सचमुच तैयार है।
मास्को वार्ता के बाद रूसी अधिकारियों ने कहा कि तालिबान को आतंकवादी संगठनों की सूची से निकालने की कोई जल्दबाजी रूस महसूस नहीं करता। उन्होंने ध्यान दिलाया कि अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार में नस्लीय और अल्पसंख्यक समुदायों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। फिर काबुल पर कब्जे के साथ ही मध्य एशियाई देशों की सुरक्षा के लिए पैदा हुआ खतरा अभी भी बना हुआ है।
अफगानिस्तान में हालात बहुत अनिश्चित
मास्को स्थित नेशनल रिसर्च यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर आंद्रेयी कजांत्सेव ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘अफगानिस्तान में हालात बहुत अनिश्चित हैं। किसी को नहीं मालूम कि कल क्या होगा। तालिबान को दरकिनार करके भी बहुत सी घटनाएं हो सकती हैं। यह मुमकिन है कि देश में भुखमरी फैल जाए और देश विघटन के कगार पर पहुंच जाए। इसीलिए रूस ने अपनी और अपने सहयोगी मध्य एशियाई देशों की सुरक्षा के लिए तमाम संसाधन इकट्ठे किए हैं।’
इसके बावजूद पर्यवेक्षकों की राय है कि रूस तालिबान के साथ अतीत में रहे अपने तनावपूर्ण रिश्ते को भुलाने को तैयार है। वह अफगानिस्तान और आसपास के देशों में उभर रही स्थितियों पर नजर रखे हुए है। कजांत्सेव ने कहा- ‘आज की स्थिति में यह संभव है कि रूसी नेतृत्व को अफगानिस्तान से संभावित खतरा अमेरिकी खतरे से कम महसूस हो।’
जानकारों का कहना है कि संभवतया इसीलिए रूस ने तालिबान के साथ संवाद बना रखा है। रूस ने तालिबान को अलग-थलग करने की कोशिशों का विरोध किया है। पिछले महीने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की थी कि वह अफगानिस्तान के बैंकों में फ्रीज किए गए धन को उसे लौटा दे और अफगानिस्तान को वित्तीय और मानवीय सहायता पहुंचाना शुरू करे। लेकिन जानकारों के मुताबिक अफगानिस्तान में आईएसआईएस-खुरासान जैसे गुटों की तेज होती गतिविधियों से रूस चिंतित भी है। इसलिए वह तालिबान को संदेश देना चाहता है कि अगर वह रूस का दोस्त बनना चाहता है, तो पहले उसे ऐसे गुटों से निपटना होगा।