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बेहाल अफगान: तालिबान ने अब तक 18 प्रांतों पर किया कब्जा, लाचार नजरों से आगे बढ़ना देख रहे यूरोपीय नेता
Sat, 14 Aug 2021 10:06 PM IST
कुमार संभव
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, ब्रसेल्स
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, ब्रसेल्स
Published by: कुमार संभव
Updated Sat, 14 Aug 2021 10:06 PM IST
सार
एक यूरोपीय राजनयिक ने वेबसाइट पॉलिटिको से कहा, 'मुझे नहीं लगता कि तालिबान पर हमारा कोई प्रभाव है। दरअसल, तालिबान एक खास स्थिति बना कर उसे हकीकत के रूप में हमारे सामने पेश करना चाहता है।'
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अफगानिस्तान संकट
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
अफगानिस्तान में तालिबान जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसे यूरोपीय नेता सदमे, भय और लाचारी के भाव से देख रहे हैं। दरअसल, यूरोपीय देशों ने अफगानिस्तान में स्थिर व्यवस्था कायम करने के अमेरिकी प्रयासों में पूरा सहयोग किया। उन्होंने अपने हजारों सैनिक वहां तैनात किए और अरबों यूरो की रकम सहायता के रूप में दी। अब जिस ढंग से तालिबान अफगानिस्तान की सरकारी सेना को आसानी से परास्त करने में सफल हो रहा है, उससे यूरोपीय राजधानियों में हैरत की भावना है।
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यूरोपियन यूनियन (ईयू) की सैनिक समिति के अध्यक्ष जनरल क्लाउडियो ग्रेजियानो ने वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू से कहा कि हमें इस बात की आशंका थी कि सिर्फ 20 हफ्तों में घड़ी की सुई लौटकर 20 साल पहले पहुंच जाएगी। दुर्भाग्यवश ऐसा लगता है कि ऐसा होने में 20 दिन भी नहीं लगेंगे। यूरोप को फिलहाल सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि अगर कट्टरपंथी तालिबान का पूरे अफगानिस्तान पर शासन कायम हो गया तो वहां से शरणार्थियों का रेला यूरोप पहुंचने लगेगा। इसके अलावा अफगानिस्तान के संकट में तुर्की और चीन की जो भूमिका बन रही है, उस पर भी यूरोपीय अधिकारियों की नजर है।
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यूरोपीय अधिकारियों ने इस बात को दो टूक स्वीकार किया है कि अफगानिस्तान में हालात को प्रभावित करने की उनकी क्षमता बेहद सीमित है। इसके अलावा यूरोपीय नेताओं में वहां नए सिरे से सैन्य हस्तक्षेप करने की इच्छा भी नजर नहीं आती। यूरोपीय देशों ने अमेरिका का अनुकरण करते हुए अपने-अपने सैनिकों को हाल ही में अफगानिस्तान से वापस बुलाया है। अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर दोहा में चल रही वार्ता में यूरोपियन यूनियन शामिल है। वहां थॉमस निकलासन ईयू के प्रतिनिधि हैं। गुरुवार (12 अगस्त) को ईयू के विदेश नीति प्रमुख जोसेप बॉरेल ने एक बयान जारी कर तालिबान से बातचीत तुरंत शुरू करने और मानव अधिकारों का सम्मान करने की अपील की। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर तालिबान ने ताकत से सत्ता पर कब्जा किया और अफगानिस्तान में इस्लामी राज की स्थापना की तो वह अंतरराष्ट्रीय रूप से अलग-थलग पड़ जाएगा। ईयू उसकी सरकार को मान्यता नहीं देगा।
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विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान शायद ही ऐसी अपीलों की अब परवाह कर रहा है। एक यूरोपीय राजनयिक ने वेबसाइट पॉलिटिको से कहा, 'मुझे नहीं लगता कि तालिबान पर हमारा कोई प्रभाव है। दरअसल, तालिबान एक खास स्थिति बना कर उसे हकीकत के रूप में हमारे सामने पेश करना चाहता है।' यूरोपीय अधिकारियों ने ध्यान दिलाया है कि यूरोप से कहीं अधिक शक्तिशाली अमेरिका भी तालिबान की बढ़त के आगे लाचार नजर आ रहा है।
यूरोप में इस बात को लेकर भी चिंता है कि अफगानिस्तान के कारण भू-राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। हाल में जब तालिबान के नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने चीन जाकर वहां के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की तो यूरोपीय राजधानियों में चिंता और बढ़ गई। उन्हें अंदेशा है कि ताजा घटनाक्रम से उस क्षेत्र में चीन का प्रभाव और बढ़ सकता है।
तुर्की ने अमेरिकी फौज की वापसी के बाद काबुल हवाई अड्डे की सुरक्षा के लिए अपने सैनिक तैनात करने की पेशकश की है। इससे भी यूरोपीय नेता चिंतित हैं। उनकी राय है कि अगर ऐसा हुआ तो सीरिया और लीबिया के बाद अब अफगानिस्तान में तुर्की अपना प्रभाव कायम कर लेगा।