श्रीलंका आर्थिक संकट: बॉन्ड धारकों में फैल रही है घबराहट, हालात संभालने के लिए सेवानिवृत बैंकर को बनाया गवर्नर
श्रीलंका सरकार ने अनुभवी बैंकर और अर्थशास्त्री नंदालाल वीरासिंघे को रिटायरमेंट से वापस लाकर फिर से सेंट्रल बैंक ऑफ श्रीलंका का गवर्नर बनाया है। वीरासिंघे ने गवर्नर पद संभालने के बाद सबसे बड़े कदम के तौर पर ब्याज दर में 700 आधार अंकों की बढ़ोतरी करने की घोषणा की...
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कर्ज के बोझ तले दबे श्रीलंका के डिफॉल्ट करने (समय पर कर्ज चुकाने में अक्षमता जताने) के बाद अब उन निवेशकों में घबराहट का आलम है, जिन्होंने श्रीलंका सरकार के बॉन्ड खरीदे थे। अब उनकी नजर श्रीलंका सरकार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के बीच अगले सोमवार से शुरू होने वाली बातचीत पर है। ये बातचीत वित्तीय सहायता के श्रीलंका के अनुरोध को लेकर होगी।
श्रीलंका सरकार ने अनुभवी बैंकर और अर्थशास्त्री नंदालाल वीरासिंघे को रिटायरमेंट से वापस लाकर फिर से सेंट्रल बैंक ऑफ श्रीलंका का गवर्नर बनाया है। विश्लेषकों की राय है कि वीरासिंघे के सामने सबसे बड़ी चुनौती बेसब्र हो रहे कर्जदाताओं को आश्वस्त करने की है। वीरासिंघे ने गवर्नर पद संभालने के बाद सबसे बड़े कदम के तौर पर ब्याज दर में 700 आधार अंकों की बढ़ोतरी करने की घोषणा की। तब उन्होंने कहा- ‘इस कदम से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों, हमारे कर्जदाताओं, और बाजार को यह संदेश मिलेगा कि हम यथाशीघ्र इस संकट से उबर जाएंगे।’
आधे से कम दाम पर बेचे गए बॉन्ड
श्रीलंका ने सोमवार (18 अप्रैल) को अपना पहला डिफॉल्ट किया। उस रोज कर्ज पर ब्याज की जो रकम उसे चुकानी थी, उसने नहीं चुकाई। श्रीलंका के आर्थिक संकट को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय बाजार में श्रीलंका सरकार के बॉन्ड्स की कीमत पहले से ही गिर रही थी। जुलाई में मैच्योर होने वाले इंटरनेशनल सॉवरेन बॉन्ड (आईएसबी) आधी से कुछ ज्यादा कीमत पर बेचे जा रहे थे। 2023 में मैच्योर हो रहे बॉन्ड्स तो आधे से भी कम कीमत पर बेचे गए हैं। निवेशकों में ये धारणा गहरा गई है कि श्रीलंका सरकार बॉन्ड पर तय ब्याज के साथ पूरी रकम उन्हें चुका पाने में सक्षम नहीं रह गई है।
कोलंबो स्थित वित्तीय परामर्शदाता कंपनी जेबी सिक्युरिटीज के प्रबंधन निदेशक मुर्तजा जाफरी ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘बाजार मूल्य बेहद नीचे थे। निवेशकों को मालूम था कि श्रीलंका डिफॉल्ट करेगा।’
विशेषज्ञों के मुताबिक श्रीलंका का यह हाल लंबे समय तक व्यापार और बजट घाटा जारी रहने के कारण हुआ है। 2020 आते-आते हाल यह हो गया कि सरकार का 70 फीसदी राजस्व ब्याज चुकाने पर खर्च करना पड़ा। खास कर कोरोना महामारी से बने हालात के कारण 2021 और 2022 में बजट घाटा सकल घरेलू उत्पाद के दस फीसदी तक पहुंच गया। पिछले मार्च की समाप्ति तक 81 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाले श्रीलंका के पास सिर्फ 20 करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा बची थी। जबकि दिसंबर 2019 में उसके विदेशी मुद्रा भंडार में 7.6 बिलियन डॉलर थे।
ये कदम करेंगे मदद
इन्हीं ताजा हालात में श्रीलंका सरकार को डिफॉल्ट करने का फैसला लेना पड़ा। लेकिन जानकारों का कहना है कि इस फैसले से आईएमएफ के साथ होने वाली बातचीत में नए पेच पड़ गए हैं। आईएमएफ पहले ही श्रीलंका सरकार को अपनी वो कसौटियां बता चुका है, जिन पर खरा उतरने के सख्त कदम उसे उठाने होंगे। आईएमएफ की राय है कि ये कदम उठाने पर ही श्रीलंका की अर्थव्यवस्था स्थिर होगी और वह कर्ज चुकाने के मामले में निवेशकों को आश्वस्त कर पाएगा।
जब तक श्रीलंका इन कसौटियों पर खरा नहीं उतरता, बॉन्डधारकों में बेचैनी फैली रहेगी। 2020 के अंत तक श्रीलंका पर 38.6 बिलियन डॉलर का विदेशी कर्ज था। इसमें बॉन्डधारकों का हिस्सा 14 बिलियन डॉलर था। जिन निवेशकों ने ये बॉन्ड खरीदे थे, वे आज इस अंदेशे में डूबे हुए हैं कि उनका यह निवेश डूब सकता है।