{"_id":"5ff040b395a97b073229b80f","slug":"sri-lanka-announce-to-scrap-the-japan-funded-light-rail-project-infrastructure-projects","type":"story","status":"publish","title_hn":"चीन के चंगुल में श्रीलंका, राजपक्षे सरकार के हालिया फैसलों से उठे सवाल","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
चीन के चंगुल में श्रीलंका, राजपक्षे सरकार के हालिया फैसलों से उठे सवाल
Sat, 02 Jan 2021 04:52 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Sat, 02 Jan 2021 04:52 PM IST
सार
राष्ट्रपति गोटाबया ने जापान की मदद से बनने वाली एक लाइट रेल परियोजना को भी रद्द करने का निर्देश दिया है। जापान की इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी (जीका) इस परियोजना के पहले चरण के लिए साढ़े 28 करोड़ डॉलर का कर्ज जारी कर चुकी थी...
विज्ञापन
President Gotabaya Rajapaksa with China Ambassador Qi Zhenhong
- फोटो : Amar Ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
क्या श्रीलंका पर चीन का प्रभाव फिर तेजी से बढ़ रहा है? ये सवाल पिछले हफ्ते श्रीलंका सरकार के उठाए एक कदम से खड़ा हुआ है। पिछले हफ्ते श्रीलंका की गोटाबया राजपक्षे सरकार ने करोड़ों डॉलर के एक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को रद्द करने का एलान किया। इस कदम को जापान और भारत के लिए एक झटका समझा गया।
विज्ञापन
पिछली रानिल विक्रमसिंघे सरकार ने मई 2019 में इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। इसके लिए जापान और भारत के साथ एक सहमति पत्र (एमओयू) पर दस्तखत किए गए थे। इसके तहत ईस्ट कंटेनर टर्मिनल (ईसीटी) का निर्माण किया जाना था। एमओयू के तहत इस परियोजना में 51 फीसदी निवेश श्रीलंका का होना था। बाकी निवेश जापान और भारत को करना था। इस परियोजना पर 500 से 700 मिलियन डॉलर (51 अरब रुपये) तक का खर्च आने का अनुमान लगाया गया था।
विज्ञापन
एक समाचार एजेंसी की खबर के मुताबिक राष्ट्रपति गोटाबया ने जापान की मदद से बनने वाली एक लाइट रेल परियोजना को भी रद्द करने का निर्देश दिया है। इस परियोजना पर डेढ़ अरब डॉलर खर्च होना था। खबर के मुताबिक राष्ट्रपति राजपक्षे ने परिवहन मंत्रालय से इस परियोजना को रद्द कर उसका कार्यालय तुरंत बंद करने का निर्देश पिछले दिनों दिया। जबकि जापान की इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी (जीका) इस परियोजना के पहले चरण के लिए साढ़े 28 करोड़ डॉलर का कर्ज जारी कर चुकी थी।
विज्ञापन
श्रीलंका सरकार के इन कदमों को लेकर यहां कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। एक कयास यह है कि राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे की सरकार ने ये कदम चीन के इशारे पर उठाए हैं। श्रीलंका चीन के कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। ऐसे में वह चीन को नाराज करने की स्थिति में नहीं है। कोरोना महामारी के कारण देश की अर्थव्यवस्था बेहद गहरे संकट में है। ऐसे में कर्ज चुकाने की चुनौती और गंभीर हो गई है।
वेबसाइट यूरेशियन टाइम्स में छपे एक ब्योरे के मुताबिक श्रीलंका ने 2005 से 2019 के बीच 34 अरब डॉलर का कर्ज लिया। इसमें 33 फीसदी कर्ज चीन से लिया गया। वेबसाइट ने कोलंबो स्थित थिंक टैंक वेरिते रिसर्च के हवाले से कहा है कि इनमें से ज्यादातर कर्ज इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए लिया गया था। अब समय उस कर्ज को चुकाने का है, लेकिन महामारी के कारण श्रीलंका तय कार्यक्रम के मुताबिक कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं है। इसलिए उसके कर्ज के जाल में फंस जाने का अंदेशा गहरा हो गया है।
इस सिलसिले में एक बार फिर हंबनतोता बंदरगाह परियोजना को लेकर रहे श्रीलंका के अनुभव की चर्चा हो रही है। श्रीलंका ने इस बंदरगाह परियोजना के निर्माण के लिए चीन से डेढ़ अरब डॉलर का कर्ज लिया था। लेकिन परियोजना पूरी होने के बाद जब इससे अपेक्षित आमदनी शुरू नहीं हुई, तो श्रीलंका मुश्किल में फंस गया। तब उसे ये बंदरगाह 99 साल के लिए चीन को लीज पर देना पड़ा। अभी हाल में चीन ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए भी 50 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया है।
बताया जाता है कि कोरोना महामारी आने के बाद श्रीलंका सरकार ने भारत सहित कई देशों से उनके कर्ज चुकाने की अवधि बढ़ाने की गुजारिश की थी। लेकिन बाकी देशों से उसे ज्यादा मदद नहीं मिली। ऐसे में वह चीन पर और अधिक निर्भर हो गया है। जापान की वेबसाइट निक्कई एशिया के मुताबिक श्रीलंका अब लाइट रेल परियोजना को चीन को सौंपने की तैयारी में है। आलोचकों का कहना है कि चीन इसी तरह के कर्ज का जाल फैला कर दुनिया के बहुत से देशों को अपने चंगुल में फंसा रहा है।
लेकिन श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे ने हाल में श्रीलंका के कर्ज के जाल में फंसने की आशंका का खंडन किया था। उन्होंने कहा था कि बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं से श्रीलंका के लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा। चीन इस काम में सिर्फ श्रीलंका की मदद कर रहा है।