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डेढ़ दशक में दोगुनी तेजी से पिघले हैं हिमालय के ग्लेशियर, हर साल घट रही ऊंचाई

Sat, 22 Jun 2019 05:01 PM IST
Sneha Baluni वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: Sneha Baluni Updated Sat, 22 Jun 2019 05:01 PM IST
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spy satellites revealed extent of ice loss in Himalayan glaciers, researchers blame climate change
उपग्रह की तस्वीरों में ऐसे दिख रहे हैं हिमालय के ग्लेशियर - फोटो : NASA

अमेरिकी उपग्रहों से प्राप्त ताज़ा तस्वीरों और पुरानी उपलब्ध तस्वीरों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चला है कि हिमालय के ग्लेशियर काफी तेजी से पिघल रहे हैं। शीत युद्ध काल के जासूसी उपग्रहों ने पुरानी तस्वीरों को खींचा था, जिनकी तुलना मौजूदा ग्लेशियरों से की गई है। वैज्ञानिकों की रिपोर्ट पढ़कर इंसान के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगता दिख रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में पिछले 40 साल में बर्फ पिघलने का सिलसिला दोगुनी रफ्तार पकड़ चुका है। शोध से पता चला है कि सन 2000 के बाद से ग्लेशियरों की ऊंचाई हर साल 0.5 मीटर कम होती जा रही है।

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शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से यह नुकसान हो रहा है। न्यूयॉर्क में कोलंबिया विश्वविद्यालय के लेमोंट-डोहर्टी पृथ्वी वेधशाला के जोशुआ माउरेर का दावा है, 'इस शोध से हमें असल में एक साफ तस्वीर मिली है जिससे पता चला है कि हिमालय के ग्लेशियरों में कैसा बदलाव आया है।' यह शोध जर्नल साइंस एडवांसिस में प्रकाशित हुआ है।
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1970-80 के दशक में अमेरिका ने पृथ्वी की तस्वीरें खींचने के लिए एक गुप्त कार्यक्रम शुरू किया था। इसका कोडनेम 'हेक्सागन' था और इसके तहत 20 उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में प्रक्षेपित किया था। यह जासूसी उपग्रह तस्वीरों को अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने वाले सैन्य विमानों को भेजा करते थे। 2011 में अमेरिकी रक्षा विभाग ने इन तस्वीरों और इनसे बनाई गई रिपोर्ट को गोपनीयता के दायरे से बाहर कर दिया था। इसके बाद यह रिपोर्ट डिजिटल फॉरमेट में भूवैज्ञानिकों को सर्वेक्षण के उपयोग के लिए दी गई थीं।
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इन जासूसी तस्वीरों को देखने से पता चलता है कि कैसे हिमालय का यह ऐतिहासिक क्षेत्र अब खतरे में है। इन तस्वीरों की तुलना नासा और जापानी अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा के उपग्रहों से प्राप्त ताजा तस्वीरों से करने पर पता चलता है कि कैसे इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति बदल रही है। कोलंबिया विश्वविद्यालय की टीम ने हाल ही में ऐसे 650 ग्लेशियरों का अध्ययन किया है जो हिमालय में 2000 किलोमीटर के दायरे में फैले हुए हैं।

टीम ने पाया कि सन 1975 से 2000 के बीच इस क्षेत्र में हर साल औसतन चार बिलियन टन बर्फ पिघली है। लेकिन साल 2000 और 2016 के बीच यह ग्लेशियर हर साल दोगुनी तेजी से पिघले हैं। माउरेर ने समझाया कि, 'आठ बिलियन टन बर्फ 3.2 मिलियन ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल को भरने के लिए पर्याप्त है। हालांकि यह बर्फ बेहद असामान्य तरीके से पिघल रही है। अधिकांश बर्फ ग्लेशियर के निचले ऊंचाई वाले हिस्सों में पिघली है। यह वही जगह है जहां बर्फ की मोटाई कम है। यहां के कुछ क्षेत्र हर साल पांच मीटर तक पतले हो रहे हैं।'

वैज्ञानिक समुदाय में इसके कारणों को लेकर बहस जारी है। इस क्षेत्र में वर्षा में आए परिवर्तन और औद्योगिक प्रदूषकों के कारण जमा कालिख को बर्फ पिघलने का दूसरा कारण माना जा रहा है। कोलंबिया की टीम का कहना है कि हिमालय का बढ़ता तापमान बर्फ पिघलने का मुख्य कारण है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इस स्थिति में बदलाव नहीं आया तो इसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा। अल्पावधि में भारी मात्रा में पानी पिघलने से बाढ़ आ सकती है। वहीं लंबे समय में इस क्षेत्र में रहने वाले लोग जो सूखा पड़ने वाले सालों में पिघले हुए पानी पर निर्भर करते हैं उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।


इस शोध पर टिप्पणी करते हुए ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण से डॉक्टर हामिश प्रिचार्ड ने कहा, 'यहां यह देखना होगा कि कैसे जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने में तेजी आ रही है। एक पीढ़ी के बाद ग्लेशियरों का पिघलना दोगुना हो गया है और ग्लेशियर तेजी से पतले होते जा रहे हैं। इसके मायने यह है कि यदि बर्फ पूरी तरह से पिघल जाती है तो एशिया की महत्वपूर्ण नदियों एक ऐसी जलापूर्ति खो देंगी जिसके कारण वह गर्मियों के मौसम में बहती हैं। पहाड़ों के ग्लेशियरों के बिना नीचे रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए सूखे से निपटना बहुत मुश्किल हो जाएगा।'

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