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ड्रैगन की विस्तारवादी नीति: परेशान हुआ यह देश, चीनी कंपनियों को मिला एक और ठेका, तो चिंता में पड़ गए देशवासी

Thu, 01 Jul 2021 04:02 PM IST
दीप्ति मिश्रा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो Published by: दीप्ति मिश्रा Updated Thu, 01 Jul 2021 04:02 PM IST
सार

पिछले महीने कोलंबो के बाहरी इलाके में 17 किलोमीटर का एलिवेटेड हाईवे बनाने का ठेका भी एक चीनी कंपनी को मिला। ठेका चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी (सीएचईसी) को मिला है। 

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Shri Lanka news update :  Concern increased in Sri Lanka after getting another contract for Chinese company
चीन का झंडा - फोटो : Social media

विस्तार

श्रीलंका की प्रमुख इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर चीन ने करीब-करीब पूरी तरह नियंत्रण कर लिया है, जिससे देश में लोगों की चिंता बढ़ रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि मौजूदा सरकार देश को चीन का उपनिवेश बनाने की दिशा में ले जा रही है। पिछले महीने कोलंबो के बाहरी इलाके में 17 किलोमीटर का एलिवेटेड हाईवे बनाने का ठेका भी एक चीनी कंपनी को मिला। उसके बाद ये चिंता और बढ़ गई है।

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विपक्षी सांसद हर्षा डि सिल्वा ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से बातचीत में ध्यान दिलाया कि ये प्रोजेक्ट कई वर्षों से लटका हुआ था। पिछली सरकार इसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत बनाना चाहती थी। आरंभिक अनुमानों के मुताबिक, इस पर एक अरब डॉलर का खर्च आना था। उन्होंने कहा कि वर्ष 2016 में जब तत्कालीन सरकार ने इस परियोजना के बारे में अध्ययन कराया, तो ये निष्कर्ष निकला था कि इसे पूरी तरह बनाओ, संचालित करो और ट्रांसफर करो (बॉट) की नीति के तहत नहीं बनाया जा सकता। लेकिन अब इसी नीति के आधार इसका ठेका चीनी कंपनी को दे दिया गया है।
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ये ठेका चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी (सीएचईसी) को मिला है। यह चीन की सरकारी कंपनी चाइना कम्यूनिकेशंस कंट्रस्ट्रक्शन कंपनी (सीसीसीसी) की सहयोगी कंपनी है। सीएचईसी से हुए डील के मुताबिक, ये कंपनी इस हाईवे को बनाएगी, 18 साल तक इसका संचालन कर अपनी लागत और मुनाफा इससे निकालेगी और फिर श्रीलंका सरकार को इसका स्वामित्व सौंप देगी। इस तरह सीएचईसी ऐसी पहली विदेशी कंपनी बन जाएगी, जिसके हाथ में श्रीलंका के किसी हाईवे का संचालन का अधिकार होगा। इस हाईवे के निर्माण पर एक अरब 40 करोड़ डॉलर का खर्च आएगा।

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बॉट: परियोजनाओं के लिए खर्च जुटाने से बेहतर

हर्षा डि सिल्वा का कहना है कि सिर्फ 17 किलोमीटर के हाईवे का संचालन करके कंपनी अपनी लागत निकाल लेगी ये संभव नहीं है, लेकिन कोलंबो यूनिवर्सिटी में सरकारी कर्ज और वित्त मामलों के अनुसंधानकर्ता उमेश मोरामुडाली ने कहा कि बिल्ड, ऑपरेट एंड ट्रांसफर (बॉट) का तरीका कर्ज लेकर परियोजनाओं के लिए खर्च जुटाने से बेहतर है। उनके मुताबिक, बॉट के तहत देश की सरकार को विदेशी निवेशकों को कोई कर्ज नहीं चुकाना पड़ता। इस तरह देश को विदेशी मुद्रा का नुकसान नहीं होता है।

लेकिन मोरामुडाली ने कहा, ''जब मैं कहता हूं कि बॉट देश के लिए अच्छा है, तो उसके साथ ही ये बात जुड़ी रहती है कि ऐसा पारदर्शी तरीके से निविदा प्रक्रिया के जरिए किया जाना चाहिए। फिर इस बात भी ख्याल रखना चाहिए कि परियोजना देश के फायदे में हो, उसे बनाने वाली कंपनी के फायदे में नहीं। यहां मुद्दा यह है कि इस बॉट परियोजना से देश में गहरा शक पैदा हुआ है।''

सीएचईसी की पहले से ही श्रीलंका में गहरी पैठ है। खासकर ये पैठ कोलंबो और हम्बनतोता में है। हम्बनतोता मौजूदा राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे और श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे का गृह शहर है। राजपक्षे के शासनकाल में श्रीलंका ने चीनी निवेश पर अपनी निर्भरता बढ़ाई है। सीएचईसी ने हम्बनतोता में बंदरगाह बनाने के अलावा मताला में हवाई अड्डा भी बनाया है। उसके बाद उसे ये नई परियोजना मिल गई है।

श्रीलंका में गैर सरकारी संस्था ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशन की उप कार्यकारी निदेशक सखिता गुनारत्ने ने वेबसाइट निक्कईएशिया से बातचीत में आशंका जताई कि बिना उचित निगरानी के हम्बनतोता शहर एक ऐसा क्षेत्र बन जा सकता है, जो श्रीलंका के कानून से बाहर होगा। वह अपराधियों के सुरक्षित अड्डे में तब्दील हो जा सकता है। लेकिन ऐसी तमाम आशंकाओं को दरकिनार कर राजपक्षे सरकार चीनी कंपनियों के प्रति मेहरबान बनी हुई है। 

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